रायगढ़/
कुछ महापुरुष अपने समय में केवल जीवन नहीं जीते, वे अपने समय की चेतना को बदलते हैं। वे रूढ़ियों के बीच विवेक का दीप जलाते हैं, आडंबरों के बीच सत्य की राह दिखाते हैं और आध्यात्म को कर्म, करुणा तथा मानव-सेवा से जोड़कर उसकी सार्थकता सिद्ध करते हैं। परम पूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी ऐसे ही विलक्षण संत-महापुरुष थे, जिनके लिए आध्यात्म किसी रहस्यमय प्रदर्शन अथवा चमत्कार का विषय नहीं, बल्कि पीड़ित मनुष्य के आँसू पोंछने और उपेक्षित मानव को सम्मान के साथ समाज की मुख्यधारा में वापस लाने का माध्यम था।*
पूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी के अवतरण दिवस का स्मरण इसलिए केवल किसी संत की जन्म-जयंती का स्मरण नहीं है; यह उस विचार और जीवन-दर्शन को पुनः स्मरण करने का अवसर है, जिसमें सेवा ही साधना, करुणा ही धर्म और मानवता ही आध्यात्म की कसौटी बन जाती है।
वे रूढ़िवादिता, पाखंड, बाह्य आडंबर और चमत्कारवाद के विरोधी थे। उन्होंने आध्यात्म को भय, प्रदर्शन और कर्मकांड की जटिलताओं से निकालकर जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ने का प्रयास किया। उनके लिए साधना का अर्थ संसार से पलायन नहीं, बल्कि संसार के दुःख के बीच उतरकर मनुष्य के साथ खड़ा होना था।
*अघोर : श्मशान से समाज तक-*
अघोर परंपरा के संबंध में आम समाज में लंबे समय तक अनेक भ्रांतियाँ रही हैं। अघोरेश्वर भगवान राम ने इस परंपरा को एक व्यापक मानवीय अर्थ दिया। उन्होंने अघोर को भय, रहस्य और चमत्कार के आवरण से निकालकर निर्भयता, समता, आत्मसंयम, करुणा और सेवा से जोड़ा।
इसलिए अघोर को केवल किसी संकीर्ण धार्मिक पंथ के रूप में देखना उसके व्यापक आशय को सीमित करना होगा। अघोर उस चेतना का नाम है जिसमें ‘घोर’—अर्थात् भय, भेद, घृणा और विकार—से ऊपर उठने का प्रयास है।
इसी अर्थ में कहा जा सकता है—
अघोर कोई पंथ नहीं, एक पद है;
अघोर केवल पहचान नहीं, एक पथ है;
और उस पथ को आधुनिक समाज में कर्म और सेवा से जोड़ने वाले महान संत थे—परम पूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी ।
उन्होंने श्मशान की साधना को समाज की पीड़ा से जोड़ा। साधना को जीवन-विमुख नहीं, जीवन-सापेक्ष बनाया। नशे और व्यसन से मुक्ति को भी उन्होंने आत्मशुद्धि और सामाजिक पुनर्निर्माण का महत्वपूर्ण अंग माना। आज अघोर परंपरा से जुड़े सेवा-कार्य नशामुक्ति, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सहायता और मानव-कल्याण के अनेक आयामों तक विस्तृत दिखाई देते हैं।
*कुष्ठ रोगियों की सेवा : करुणा की सबसे कठिन परीक्षा-*
अघोरेश्वर भगवान राम के जीवन की सबसे प्रेरक विशेषताओं में कुष्ठ रोगियों की सेवा का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जिस समाज में कुष्ठ रोगियों को देखकर लोग रास्ता बदल लेते थे, जहाँ बीमारी से अधिक सामाजिक बहिष्कार उनका जीवन कठिन बनाता था, वहाँ भगवान राम ने उन्हें दया के पात्र मात्र नहीं माना—उन्होंने उन्हें सम्मान और अधिकार के साथ मनुष्य के रूप में देखा।
इसी भावना से वाराणसी के पड़ाव में अवधूत भगवान राम कुष्ठ सेवा आश्रम की स्थापना हुई।
उपलब्ध संस्थागत विवरण के अनुसार यह सेवा-केन्द्र जनवरी 1962 में प्रारंभ हुआ और यहाँ कुष्ठ रोगियों को उपचार के साथ भोजन, वस्त्र, आश्रय तथा सामाजिक पुनर्वास का वातावरण उपलब्ध कराया गया।
यह सेवा केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं थी। रोगियों को यह एहसास दिलाना कि वे समाज से बहिष्कृत नहीं हैं, अपने आप में एक महान सामाजिक उपचार था।
इस सेवा की वैश्विक मान्यता का उल्लेख गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी मिलता है।
गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार अवधूत भगवान राम कुष्ठ सेवा आश्रम ने 15 दिसंबर 1998 तक 99,045 पंजीकृत कुष्ठ रोगियों का उपचार किया था और इसे सबसे अधिक कुष्ठ रोगियों के उपचार से संबंधित विश्व रिकॉर्ड के रूप में दर्ज किया गया।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझने की है—रिकॉर्ड संख्या का नहीं, उस मानवीय दृष्टि का है जिसने उन लोगों तक पहुँचने का साहस किया जिन्हें समाज ने छूने तक से इंकार कर दिया था।
कुष्ठ रोगी की सेवा में अपने हाथ बढ़ाना केवल चिकित्सा नहीं था; वह सामाजिक रूढ़ि के विरुद्ध मनुष्यता का हस्ताक्षर था।
*सेवा को साधना बनाने का संकल्प -*
परम पूज्य श्री अघोरेश्वर भगवान राम जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि आध्यात्म यदि मनुष्य के दुःख से नहीं जुड़ता, तो वह अधूरा है।
इसी मानवीय दृष्टि को संस्थागत स्वरूप देने के लिए श्री सर्वेश्वरी समूह की स्थापना 21 सितंबर 1961 को हुई। इसका उद्देश्य सामाजिक और आध्यात्मिक उत्थान को सेवा के माध्यम से आगे बढ़ाना था।
समूह का 19-सूत्रीय कार्यक्रम इस विचार की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है। इसमें दिव्यांगों और कुष्ठ रोगियों की सेवा, जरूरतमंदों को भोजन-वस्त्र-औषधि, आपदा-पीड़ितों की सहायता, नेत्र शिविर, अनाथ बच्चों का संरक्षण, सादगीपूर्ण विवाह, गरीबों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था, सस्ती चिकित्सा तथा प्राकृतिक आपदाओं में राहत जैसे कार्य शामिल हैं।
इस 19-सूत्रीय कार्यक्रम की विशेषता यही है कि इसमें आध्यात्मिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व अलग-अलग नहीं हैं। पूजा के साथ सेवा, साधना के साथ श्रम और आत्मकल्याण के साथ लोककल्याण—यही इसकी मूल भावना है।
अर्थात् आश्रम केवल चारदीवारी नहीं; मनुष्य का घर ही सेवा का आश्रम बन सकता है।
*गुरु का स्थान सर्वोच्च: अघोर परंपरा की आत्मा-*
अघोर परंपरा में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल मंत्र देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि साधक को अज्ञान से ज्ञान, भय से निर्भयता और आत्मकेंद्रित जीवन से लोकमंगल की ओर ले जाने वाली चेतना है।
अघोरेश्वर भगवान राम के जीवन में भी गुरु-परंपरा का महत्व इसी व्यापक अर्थ में दिखाई देता है। यहाँ गुरु-भक्ति अंधानुकरण नहीं, बल्कि गुरु के जीवन-संदेश को आचरण में उतारने की साधना है।
इसलिए किसी गुरु को मानने की सार्थकता केवल चरणों में सिर झुकाने में नहीं, बल्कि उनके बताए रास्ते पर चलने में है।
यदि गुरु ने करुणा सिखाई है तो पीड़ित के प्रति करुणा हो;
यदि सेवा सिखाई है तो सेवा हो;
यदि नशामुक्ति का संदेश दिया है तो स्वयं संयमित जीवन हो;
यदि आडंबर-विरोध सिखाया है तो जीवन में सादगी हो।
यही गुरु-परंपरा की वास्तविक गरिमा है।
*चमत्कार नहीं, आदर्श चरित्र निर्माण -*
अघोरेश्वर भगवान राम की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने आध्यात्मिक शक्ति को चमत्कार के प्रदर्शन में नहीं, मानव-आदर्श चरित्र के निर्माण में देखा।
आज जब धार्मिकता कई बार प्रदर्शन, भीड़, भव्यता और बाह्य आडंबर से मापी जाने लगती है, तब उनका जीवन एक मौलिक प्रश्न खड़ा करता है—क्या हमारी आध्यात्मिकता ने हमें अधिक करुणाशील बनाया? क्या हमने किसी पीड़ित के जीवन में थोड़ी रोशनी पैदा की? क्या हमने अपने भीतर के लोभ, क्रोध, अहंकार और व्यसन पर विजय पाने का प्रयास किया?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘हाँ’ है, तभी साधना का अर्थ जीवन में उतरता है।
परम पूज्य श्री अघोरेश्वर भगवान राम जी का संदेश इसी कारण आज भी प्रासंगिक है। उनका आध्यात्म मनुष्य को संसार से काटता नहीं, बल्कि संसार के सबसे पीड़ित मनुष्य के पास ले जाता है।
*मानवता ही अंतिम धर्म -*
उनकी दृष्टि में मनुष्य की जाति, वर्ग, सामाजिक स्थिति या बाहरी पहचान सेवा के बीच दीवार नहीं बननी चाहिए। 19-सूत्रीय कार्यक्रम में भी सार्वभौमिक मानवता और भेदभाव-विहीन सेवा की स्पष्ट भावना दिखाई देती है।
यही कारण है कि अघोरेश्वर भगवान राम को केवल एक साधक या संत के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। *वे एक सामाजिक चेतना के युगप्रवर्तक भी थे।*
उन्होंने बताया कि समाज परिवर्तन केवल भाषणों से नहीं होता। उसके लिए अपने हाथों को सेवा में लगाना पड़ता है, अपने जीवन में संयम लाना पड़ता है और सबसे उपेक्षित व्यक्ति के साथ खड़ा होना पड़ता है।
*‘औघड़दानी’ से ‘अघोरेश्वर महाप्रभु’ तक-*
भक्तों और अनुयायियों के बीच वे औघड़दानी, अघोरेश्वर महाप्रभु जैसे श्रद्धापूर्ण संबोधनों से स्मरण किए जाते हैं। श्रद्धालु उन्हें सदाशिव का अवतार भी मानते हैं।
यह आस्था,श्रद्धा और विश्वास का पथ है, जिसका मूल्यांकन वैज्ञानिक इतिहास की कसौटी पर नहीं, श्रद्धा और आध्यात्मिक अनुभव के संदर्भ में किया जाता है। लेकिन उनकी महत्ता को केवल इस आस्था तक सीमित कर देना भी उनके जीवन के सामाजिक पक्ष के साथ न्याय नहीं होगा।
उनकी सबसे बड़ी तपस्या उन कार्यों में दिखाई देती है जो उन्होंने समाज के बीच किए—कुष्ठ रोगियों की सेवा, पीड़ितों की सहायता, सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध चेतना, नशामुक्ति, सादगीपूर्ण जीवन और सेवा को साधना का स्वरूप देना।
यही वह धरातल है जहाँ संतत्व लोकमंगल से जुड़ता है।सानिध्य में आते ही जब मनुष्य अपने जीवन को आदर्श,चरित्रवान,और पवित्र सुमंगल से सुशोभित पाता है।
*आज के समय में परम पूज्य अघोरेश्वर भगवान राम की प्रासंगिकता -*
आज विज्ञान और तकनीक ने मनुष्य को अभूतपूर्व सुविधाएँ दी हैं, लेकिन इसके साथ अकेलापन, तनाव, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति, सामाजिक असमानता, वृद्धों और कमजोर वर्गों की उपेक्षा तथा धार्मिक आडंबर जैसी समस्याएँ भी हमारे सामने हैं।
ऐसे समय में परम पूज्य श्री अघोरेश्वर भगवान राम जी का जीवन हमें किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करना नहीं सिखाता। वह हमें अपने भीतर और अपने आसपास परिवर्तन शुरू करने की प्रेरणा देता है।
किसी कुष्ठ रोगी से घृणा न करना,
किसी भूखे को भोजन देना,
किसी असहाय को सहारा देना,
नशे में डूबे व्यक्ति को पुनः जीवन की ओर लाना,
किसी गरीब के बच्चे को शिक्षा देना,
किसी पीड़ित के आँसू पोंछना—
यही वह कर्म है जिसमें आध्यात्म की वास्तविक परीक्षा होती है।
और शायद यही परम पूज्य श्री अघोरेश्वर भगवान राम जी की साधना का सबसे सरल और सबसे कठिन संदेश भी है।
*अवतरण दिवस का वास्तविक संकल्प-*
अघोरेश्वर भगवान राम के अवतरण दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि देने का सबसे सुंदर तरीका केवल पुष्प अर्पित करना नहीं, बल्कि उनके जीवन-संदेश को अपने व्यवहार में उतारना है।
हम अपने भीतर के अंधविश्वास पर विवेक की विजय स्थापित करें।पाखंड और आडंबर से मुक्त होकर सत्य और सादगी का जीवन जिएँ।नशे से स्वयं दूर रहें और दूसरों को भी उससे मुक्त कराने में सहयोग करें।
बीमार, गरीब, वृद्ध, दिव्यांग और उपेक्षित व्यक्ति को बोझ नहीं, अपना मनुष्य-बंधु समझें।
और सबसे बढ़कर—सेवा को किसी पुरस्कार या प्रसिद्धि की अपेक्षा से नहीं, मनुष्य होने के दायित्व के रूप में स्वीकार करें।परम पूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी का जीवन हमें यही बताता है कि आध्यात्म का सर्वोच्च शिखर मनुष्य से दूर नहीं, मनुष्य के बीच है।
उनकी साधना श्मशान से शुरू होकर समाज तक पहुँची और समाज से मानवता के विराट क्षितिज तक विस्तृत हुई। उन्होंने अघोर को भय और रहस्य के घेरे से निकालकर सेवा, समता, करुणा और आत्मशुद्धि के मार्ग से जोड़ा।
इसलिए उन्हें स्मरण करना केवल अतीत को स्मरण करना नहीं है; यह वर्तमान को बेहतर बनाने का संकल्प है।
आज, जब उनके अवतरण दिवस पर हम उनके जीवन और संदेश को श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहे हैं, उसी समय यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि उनकी मानवसेवा की परंपरा केवल स्मृतियों में नहीं, बल्कि वर्तमान में भी निरंतर आगे बढ़ रही है।
*परम पूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी के उत्तराधिकारी संतों में से एक, उनके अनन्य प्रिय एवं अनुशासित शिष्य औघड़ संत पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी इसी मानवसेवा के महासंकल्प को पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट, बनोरा के माध्यम से सेवा, शिक्षा और सामाजिक उत्थान के विविध कार्यों को निरंतर विस्तार दिया जा रहा है।*
*इसी सेवा-परंपरा की एक महत्वपूर्ण और दूरगामी कड़ी के रूप में आज आदर्श, गुणवत्तापूर्ण एवं आधुनिक शिक्षा के उद्देश्य से उच्चस्तरीय, डिजिटल सुविधाओं से युक्त भव्य अघोरेश्वर विद्या मंदिर का लोकार्पण कर उसे समाज को समर्पित किया जा रहा है।*
यह केवल एक विद्यालय का लोकार्पण नहीं है; यह उस विचार का विस्तार है जिसमें मानव-सेवा के साथ भावी पीढ़ी के निर्माण को भी साधना का अनिवार्य अंग माना गया है। यदि अघोरेश्वर भगवान राम ने उपेक्षित और पीड़ित मनुष्य की सेवा के माध्यम से मानवता को स्पर्श किया, तो आज उनकी परंपरा शिक्षा के माध्यम से ऐसी पीढ़ी तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जो ज्ञान के साथ संवेदना, आधुनिकता के साथ संस्कार और सफलता के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व को भी समझे।
एक विद्यालय भवन का निर्माण ईंट, पत्थर और आधुनिक सुविधाओं से होता है; लेकिन एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण ज्ञान, संस्कार, अनुशासन, करुणा और मानवीय मूल्यों से होता है। अघोरेश्वर विद्या मंदिर का यह प्रयास इसी व्यापक उद्देश्य की ओर एक सार्थक कदम के रूप में देखा जाना चाहिए।
अघोरेश्वर भगवान राम का संदेश हमें भीतर के अंधकार से प्रकाश की ओर, रूढ़ि से विवेक की ओर, आडंबर से सत्य की ओर और स्वार्थ से सेवा की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। उनके अवतरण दिवस पर इससे बेहतर संकल्प और क्या हो सकता है कि हम उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए मनुष्य की सेवा करें, समाज को शिक्षित करें और आने वाली पीढ़ियों में मानवता का संस्कार विकसित करें।
*अघोर कोई संकीर्ण पंथ नहीं—मानवता की ओर जाने वाला पथ है -*
अघोर किसी बाहरी वेश का नाम नहीं—भीतर के ‘घोर’ से मुक्त होने की साधना है।अघोर सहज और सरल है।
*और उस पथ पर परम पूज्य श्री अघोरेश्वर भगवान राम जी का जीवन आज भी एक प्रकाश-स्तंभ की तरह हमारे सामने खड़ा है।*
*जिन्होंने साधना को सेवा दी,*
*सेवा को करुणा दी,*
*करुणा को मानवता दी*
*और मानवता को आध्यात्म की प्रतिष्ठा।*
और इस पथ पर अघोरेश्वर भगवान राम की करुणा, साधना और सेवा की ज्योति आज भी जल रही है—
कहीं किसी पीड़ित के घाव पर मरहम बनकर,
कहीं किसी असहाय के जीवन में सहारा बनकर,
और आज ज्ञान के दीप जलाने वाले एक विद्यालय के रूप में।
अवतरण दिवस पर मानवता,सेवा ,दया और करुणा के सागर , युगदृष्टा महान संत परम पूज्य श्री अघोरेश्वर महाप्रभु के श्री चरणों में कोटि कोटि श्रद्धानत नमन—
जय मां गुरु।
लेखक/-

गणेश कछवाहा
“काशीधाम”
रायगढ़, छत्तीसगढ़।
gp.kachhwaha@gmail.com

Recent Comments