रायगढ़।
गहराइयों में बसे घने जंगलों और हाथियों की वीरता से परिपूर्ण उस क्षेत्र में, जहाँ प्रकृति का अनमोल वरदान जीवन का आधार है। यहां अब हरियाली की जगह कोयला खदान खोलने सरकार ने अनुमति दे दी है और जिला प्रशासन जन सुनवाई कराने तारीख घोषित कर दिया है। इसके विरोध में जन आदिवासी समुदाय अपने अधिकारों के प्रति अपराजेय धैर्य और संकल्प के साथ खड़ा है। खदान के विरोध में कलेक्ट्रेट पहुंचकर आवाज को बुलंद किया।

लोककथाओं की तरह, उनकी आत्मा में बसी है वन की पुण्यलिपि, जिसके संरक्षण की जिम्मेदारी उनका विश्वसनीय धर्म है। पेसा कानून की माला इस क्षेत्र में आदिवासियों के अधिकारों का अभिषेक करता है, परंतु इस धरा पर विकास के नाम पर खलनायकों के कदम अवैध शिकार और वनों की अंधाधुंध कटाई का परिचायक बन चुके हैं।

इस संघर्ष में, जंगल की हृदयस्पर्शी आवाज़ें अनवरत गूंज रही हैं—मानवीय जीवन और जैव विविधता का समतल संतुलन बनाने की पुकार।यह अद्भुत दृश्य है वहीन परी-कथा जैसी, जहाँ आदिवासी बहुल्य क्षेत्र के लोग, अपनी परंपरा, संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। वहाँ का हर शख्स, अगरबत्ती की नर्म खुशबू और जंगल की हरियाली में रंगीनी का संदेश फैलाते हैं। यहाँ का सुकून भरा स्वरा प्रकृति के गीतों का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है, जो देश-विदेश के पर्यावरण पाठकों का दिल छू जाता है। साधना की इस यात्रा में, आदिवासियों का सिद्धांत है कि यह जंगल केवल पेड़-पौधे नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं—यह हमारी सांस्कृतिक विरासत का स्रोत हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत की तरह हैं। उनके संघर्ष की कहानी, संघर्षों का अध्याय, हमारे समाज के स्थाई मूल्यों का प्रचार करती है।यहाँ का जीवन अपने धारावाहिक पाठ्यक्रम में हरे-भरे जंगल की रक्षा का संदेश फैलाते हुए, हर एक के हृदय में अनंत आशा और संकल्प का दीप जलाता है। यह संघर्ष न केवल वनों की रक्षा का ही नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक पल का उत्सव माना जाता है—जिसमें प्रकृति के प्रति सम्मान और आस्था अपनी सहजता से उबलती है। इस बिना रुके चल रहे जागरूकता के अमिट संदेश को मानवता का स्मरण करना चाहिए, क्योंकि जंगल की रक्षा का यह दर्पण हमारी सभ्यता का परम उत्कर्ष है।यह संघर्ष तो जारी रहेगा, जब तक जंगल की शांतिप्रिय चेतना और आदिवासी समुदाय का यह दावानल, प्रकृति की अद्भुत सुंदरता और समरसता का अमर पैगाम बन कर रह जाएगा।
घने जंगलों के संरक्षण और आदिवासियों के अधिकारों के लिए चल रहे संघर्ष के बीच, पुलिस ने इलाके में कड़े बंदोबस्त कर रखे थे, जिसमें कलेक्टर के मुख्य गेट को भी बंद रखा गया था। लेकिन आदिवासी ग्रामीणों के दृढ़ संकल्प और अनवरत संघर्ष के सामने पुलिस झुक गई है। पुलिस को मजबूरन कलेक्टर कार्यालय का मुख्य गेट खोलना पड़ा है।यह घटना आदिवासी समुदाय की संघर्ष शक्ति और जंगल की रक्षा के प्रति उनकी गहरी आस्था को दर्शाती है। ग्रामीणों का यह संघर्ष केवल अपने अधिकारों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता और प्रकृति के सम्मान के लिए एक अमिट संदेश बनकर उभरा है। खदान प्रभावित ग्राम पंचायत तेन्दुमुड़ी, पुरुंगा और साम्हरसिंघा पंचायत और उसके आश्रित गांव के हजारों ग्रामीण महिला पुलिस हाथो में तख्तियां लिए जल जंगल जमीन और वन्य जीवन बचाने के लिए आवाज बुलंद किया।
इस बदलाव से यह स्पष्ट होता है कि प्रशासन भी अब आदिवासियों की आवाज़ को गंभीरता से सुनने लगा है और जंगल के संरक्षण तथा विकास के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है। आदिवासी समुदाय का यह संघर्ष निरंतर जारी रहेगा, जो जंगल की शांति और समरसता का दर्पण बनकर हमारे समाज को प्रेरित करता रहेगा।

अडानी ग्रुप द्वारा पुरूंगा कोल माइंस से कोयला उत्खनन करने की अनुमति (MDO) मिली है। कंपनी द्वारा 869.025 हेक्टेयर क्षेत्रफल से 2.25 मिलियन टन प्रति वर्ष कोयला निकलेगी । प्रतिवर्ष 2.25 टन कोयला खदान की उत्पादन क्षमता वाली भूमिगत कोयला खदान का प्रस्ताव दिया गया है। प्रस्तावित क्षेत्र में 621.331 हेक्टेयर वन भूमि, 26.898 हेक्टेयर गैर-वन भूमि, एवं 220.796 हेक्टेयर निजी भूमि शामिल है। यह खदान ग्राम पंचायत तेन्दुमुड़ी, पुरुंगा और साम्हरसिंघा के क्षेत्र को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करेगी। इसके खिलाफ ग्रामीणों ने पेसा कानून का प्रयोग करते हुए ग्राम सभा में जल जंगल जमीन के पक्ष में ग्राम सभा कराकर जिला प्रशासन को अवगत करा दिया है। फैसला अब जिला प्रशासन के पाले में है देखना है इस पर क्या फैसला आता है।



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