Saturday, June 13, 2026
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पेलमा कोल ब्लॉक जनसुनवाई से पहले आदिवासियों का फूट कर मार रहा उबाल…SECL की अडानी प्रोजेक्ट के मुआवजे और नौकरी की लिखित गारंटी पर अड़े 8 प्रभावित गांवों के ग्रामीण …पहली बार है कि प्रलोभन के सामान कलेक्ट्रेट पहुंचकर लौटाए जा चुके हैं …इधर प्रशासनिक चुप्पी पर उठाए सवाल

 

 

 

रायगढ़। छत्तीसगढ़ के तमनार ब्लॉक अंतर्गत पेलमा कोल ब्लॉक के लगभग 2077 हेक्टेयर क्षेत्र में आगामी 8 जून को प्रस्तावित पर्यावरण जनसुनवाई से पहले पेलमा, उरबा, लालपुर, हिंजर और मिलूपारा समेत 8 प्रभावित गांवों के ग्रामीणों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
विकास के दावों के बीच इस क्षेत्र में अविश्वास और कॉर्पोरेट खौफ की तस्वीर उभर रही है, क्योंकि जमीन की कीमत, विस्थापन, नौकरी और मुआवजे की ठोस गारंटी को लेकर प्रभावित आदिवासियों द्वारा 18 मई से 2 जून तक तपती गर्मी में रायगढ़ कलेक्टर और एसडीएम को सौंपे गए आधा दर्जन से अधिक ज्ञापनों पर प्रशासन ने अब तक पूरी तरह चुप्पी साधे रखी है।

भारी विरोध के कारण जनसुनवाई की तारीख भले ही 19 मई से बढ़ाकर 8 जून कर दी गई, लेकिन 20 दिनों बाद भी प्रशासन ने मांगों पर कोई बैठक नहीं बुलाई है और ग्रामीणों को केवल मौखिक आश्वासन का झुनझुना थमाया जा रहा है। ग्रामीण अब समझ चुके हैं कि इन मौखिक बातों का कोई मोल नहीं है और वे सरकारी सील वाले फाइनल अवार्ड (मुआवजा पत्रक) के रूप में लिखित पुष्टि की मांग कर रहे हैं।

कागजों पर यह खदान भले ही भारत सरकार की उपक्रम एसईसीएल (SECL) की है, लेकिन 23 अगस्त 2023 को हुए एमडीओ (माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर) एग्रीमेंट के जरिए बैकएंड से हुई अडानी प्रबंधन की एंट्री ने ग्रामीणों के भीतर छले जाने का खौफ पैदा कर दिया है। इस विरोध को दबाने और प्रलोभन देने के लिए कंपनी प्रबंधन द्वारा हाल ही में ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरत के सामान बांटे गए थे, जिसे आदिवासियों ने अपने स्वाभिमान का परिचय देते हुए रायगढ़ जिला कलेक्ट्रेट ऑफिस लाकर वापस कर दिया और प्रबंधन की लिखित शिकायत दर्ज कराई। इससे स्पष्ट है कि यह आंदोलन किसी लालच से नहीं टूटेगा।

ग्रामीणों की स्पष्ट मांग है कि कलेक्टर गाइडलाइन के बजाय जमीन का एक समान रेट मिले, प्रति दो एकड़ जमीन पर एसईसीएल की स्थायी नौकरी दी जाए और भूमिहीनों को भी उचित मुआवजा मिले। इसके लिए बैठक की बात कही गई थी जिस पर प्रशासन ने 20 दिनों में एक बैठक तक नहीं बुलाई।
उसके लिए जनसुनवाई से पहले फाइनल अवार्ड पास करना और नौकरी की कागजी गारंटी देना असंभव लगता है। ऐसे में ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि बिना अवार्ड फाइनल किए भारी पुलिस बल की तैनाती के बीच पर्यावरण मंजूरी के लिए सिर्फ जनसुनवाई का कोरम पूरा करने की रस्म अदायगी की जाएगी । इसके बाद बंद कमरों में शर्तें कंपनी के मुनाफे के हिसाब से तय होंगी और ग्रामीणों के आवेदन ठंडे बस्ते में डाल दिए जाएंगे । लेकिन बिना लिखित गारंटी के पेलमा में खदान खोदने की राह आसान नहीं होगी। जैसा कि वर्तमान में प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों में जनसुनवाई के खिलाफ माहौल बन चुका है। फिलहाल देखना है कि ऊंट किस करवट बैठता है।

 

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