Saturday, June 13, 2026
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विकास पर कालिख का साया : आखिर जिम्मेदार कौन…? शोहरत की फ़ज़ाओं में इतना न उड़ो ‘सागर’… परवाज़ न खो जाए इन ऊँची उड़ानों में…..पढ़ें पूरी आलेख इस ज्वलंत प्रमुख मुद्दे और परिपेक्ष्य पर आधारित… इस शख्सियत के लिए चुनौती…

 

 

 

 

——- गणेश कछवाहा/रायगढ़ ——- प्रवास पुणे / –

हाल ही में रायगढ़ के विधायक एवं प्रदेश सरकार के मंत्री माननीय ओ. पी. चौधरी का जन्मदिन बड़े उत्साह और भव्यता के साथ मनाया गया। समर्थकों और शुभचिंतकों ने उन्हें विकासदूत, विकासपुरुष, जननायक तथा अनेक विशेषणों से अलंकृत किया। मालाओं, गुलदस्तों, ढोल-नगाड़ों, आतिशी नारों और जयघोषों के बीच जनसमर्थन का यह दृश्य निश्चित रूप से आकर्षक और प्रभावशाली था। बड़ी संख्या में लोग इस आयोजन के साक्षी बने और अपने लोकप्रिय जनप्रतिनिधि के प्रति सम्मान एवं स्नेह व्यक्त करते दिखाई दिए।

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों के प्रति जनता का प्रेम और विश्वास किसी भी समाज की सकारात्मक शक्ति माना जाता है। जनसमर्थन से ही नेतृत्व को कार्य करने की ऊर्जा और वैधता प्राप्त होती है। किंतु प्रत्येक उत्सव और उपलब्धि के बीच कुछ ऐसे प्रश्न भी होते हैं, जो भीड़ के शोर में अक्सर दब जाते हैं। रायगढ़ की जनता के मन में भी ऐसा ही एक प्रश्न वर्षों से मौजूद है—क्या विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल रहे हैं, अथवा विकास की चमक के पीछे प्रदूषण की कालिख धीरे-धीरे जनजीवन को प्रभावित कर रही है?

रायगढ़ लंबे समय से औद्योगिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। उद्योगों ने रोजगार, आर्थिक गतिविधियों और आधारभूत संरचनाओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह भी सत्य है कि औद्योगिक विकास के कारण जिले को नई पहचान मिली है। किंतु इसके साथ ही वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और कोयले की धूल की समस्या भी समय-समय पर चर्चा का विषय बनी रही है। अनेक क्षेत्रों में रहने वाले लोग आज भी स्वच्छ हवा और स्वस्थ वातावरण की अपेक्षा रखते हैं।

विकास का वास्तविक अर्थ केवल सड़कों, भवनों, पुलों और निवेश परियोजनाओं तक सीमित नहीं होता। विकास का उद्देश्य मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाना है। यदि आर्थिक प्रगति के साथ नागरिकों का स्वास्थ्य प्रभावित होने लगे, बच्चों और बुजुर्गों को सांस संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़े, जल स्रोत प्रदूषित हों और वातावरण में असुरक्षा का भाव बढ़े, तो विकास की परिभाषा अधूरी रह जाती है।

माननीय ओ. पी. चौधरी का राजनीतिक जीवन सामान्य नेताओं से कुछ अलग रहा है। भारतीय प्रशासनिक सेवा जैसे प्रतिष्ठित पद को त्यागकर राजनीति में प्रवेश करना आसान निर्णय नहीं था। इस निर्णय ने जनता के बीच नई उम्मीदों को जन्म दिया। लोगों को लगा कि प्रशासनिक अनुभव और दूरदर्शी सोच के कारण जिले को नई दिशा मिलेगी। जनता ने भरपूर विश्वास व्यक्त किया और उन्हें प्रचंड समर्थन भी दिया। उनके कार्यकाल में कई विकास योजनाएँ प्रारंभ हुईं और जिले के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण भी सामने आया।

फिर भी यह प्रश्न बना हुआ है कि पर्यावरण और प्रदूषण जैसी मूलभूत समस्याओं के समाधान में अपेक्षित प्रगति क्यों दिखाई नहीं देती? यदि विकास योजनाओं के साथ-साथ प्रदूषण की समस्या भी बढ़ती हुई महसूस हो रही है, तो इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। यह किसी एक व्यक्ति या संस्था की आलोचना का विषय नहीं, बल्कि सामूहिक आत्ममंथन का प्रश्न है।

यह भी एक सामाजिक सत्य है कि प्रत्येक जनप्रतिनिधि के आसपास प्रशंसकों और समर्थकों का एक दायरा बन जाता है। उनमें से अनेक निष्ठावान और समर्पित होते हैं, किंतु कुछ लोग केवल प्रशंसा और प्रचार तक सीमित रह जाते हैं। वे जनप्रतिनिधि को वास्तविक समस्याओं और जनभावनाओं से अवगत कराने के बजाय केवल सकारात्मक चित्र प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। परिणामस्वरूप कई बार गंभीर समस्याएँ प्राथमिकता सूची में पीछे छूट जाती हैं।

किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए सबसे उपयोगी व्यक्ति वह नहीं होता जो हर पल हर किसी बात पर ताली बजाए, बल्कि वह होता है जो समाज की वास्तविक समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करे। सच्चा शुभचिंतक वही है जो समय आने पर कठिन प्रश्न पूछने का साहस रखे। लोकतंत्र में रचनात्मक आलोचना और जनसरोकार ही सुशासन की आधारशिला हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि रायगढ़ के विकास मॉडल में पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल किया जाए। प्रदूषण नियंत्रण के लिए प्रभावी निगरानी व्यवस्था, उद्योगों की जवाबदेही, वैज्ञानिक अध्ययन, पारदर्शी रिपोर्टिंग और जनभागीदारी को मजबूत बनाया जाए। स्वच्छ वायु और स्वच्छ जल किसी विलासिता की वस्तु नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार हैं।

विकास की सफलता केवल आंकड़ों और घोषणाओं से नहीं मापी जाती। उसकी वास्तविक कसौटी यह है कि आम नागरिक का जीवन कितना सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मानजनक हुआ है। यदि जनता को स्वच्छ वातावरण उपलब्ध नहीं हो पा रहा, तो विकास की उपलब्धियों पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

रायगढ़ की जनता विकास चाहती है, उद्योग चाहती है, रोजगार चाहती है; लेकिन साथ ही वह स्वच्छ हवा, स्वच्छ जल और सुरक्षित भविष्य भी चाहती है। विकास और पर्यावरण परस्पर विरोधी नहीं हैं। दूरदर्शी नेतृत्व वही होता है जो दोनों के बीच संतुलन स्थापित कर सके।

आज का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि विकास की चमक पर प्रदूषण की कालिख दिखाई दे रही है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? प्रशासन, उद्योग, जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठन अथवा स्वयं समाज? संभवतः उत्तर इन सभी की साझा जिम्मेदारी में निहित है।

*समय रहते यदि इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह प्रश्न अवश्य पूछेंगी कि हमने विकास तो किया, लेकिन क्या हमने उनके लिए सांस लेने योग्य वातावरण भी छोड़ा?*
*झूठी प्रशंसा,सम्मान और मान प्रतिष्ठा से बचते हुए अपने जीवन को सुंदर और समाज के प्रति जवाबदेही बनाने का प्रयास करना चाहिए।वही सच्चा जनसेवक या जननायक बन पाता है।सभी को अपने जीवन में मशहूर शायर सागर आज़मी की यह पंक्ति को सदैव ध्यान में रखना चाहिए -*

*“शोहरत की फ़ज़ाओं में इतना न उड़ो ‘सागर’,*
*परवाज़ न खो जाए इन ऊँची उड़ानों में।”*

— लेखक
चिंतक, लेखक एवं समीक्षक
रायगढ़, छत्तीसगढ़।
gp.kachhwaha@gmail.com

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