Saturday, August 29, 2026
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छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने कोल ब्लॉक निरस्त करने और न्यायिक जांच की उठाई मांग …प्रेसवार्ता कर ग्रामीणों पर दमन का आरोप फर्जी गिरफ्तारी, महिलाओं से अभद्रता और पुलिस–कंपनी की मिलीभगत का किया दावा

तमनार के गारे पेलमा सेक्टर-1 में खनन के खिलाफ उठी जन-आवाज़ छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन का दावा

 

रायगढ़।
तमनार विकासखंड के गारे पेलमा सेक्टर-1 कोयला खदान क्षेत्र में चल रही खनन गतिविधियों और 26–27 दिसंबर 2025 की घटनाओं को लेकर छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन द्वारा ग्रामीणों की शिकायत के आधार पर संस्था के पदाधिकारियों की एक टीम ने पूरे घटनाक्रम पर गांव पहुंचकर एक रिपोर्ट तैयार किया इसके आधार पर एक प्रेस वार्ता आयोजित कर गंभीर आरोप लगाए गए।

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन की ओर से लाखन सुबोध,
अमित कुमार वर्मा अधिवक्ता और शालिनी गोरा अधिवक्ता के द्वारा प्रेस वार्ता कर संस्था की ओर से आरोप लगाया कि जिंदल कंपनी द्वारा संचालित खनन ने पूरे इलाके को पर्यावरणीय, सामाजिक और मानवीय संकट में झोंक दिया है, वहीं विरोध करने वाले ग्रामीणों और आंदोलनकारियों पर पुलिस दमन कर कम्पनी और पुलिस की मिली भगत कर फर्जी प्रकरण और अमानवीय व्यवहार किया गया।

प्रेस वार्ता में बताया गया कि गारे पेलमा सेक्टर-1 और आसपास के क्षेत्रों में बीते 10–11 वर्षों से लगातार खनन जारी है, लेकिन इसके बदले ग्रामीणों को विकास रोजगार या पुनर्वास कुछ भी नहीं मिला। खनन के कारण गांव चारों ओर से गहरे गड्ढों से घिर चुके हैं, खेत तबाह हो गए हैं, पीने का पानी दूषित हो गया है और चारों दिशाओं से उड़ने वाली कोयले की धूल ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। खदान की वजह से ग्रामीणों को होने वाली समस्या पर कोई बात नहीं करता बस किसी तरह उन्हें हटाना ही एक मात्र मकसद है।

 

संस्था की ओर से यह भी कहा कि जिंदल कंपनी की माइनिंग के चलते कई गांव टापू जैसे हालात में बदल गए हैं। बस्तियों के चारों ओर खदानें खोद दी गईं, जिससे न तो सार्वजनिक भूमि बची और न ही सुरक्षित रास्ते। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें न तो उचित मुआवजा मिला और न ही पुनर्वास की कोई ठोस व्यवस्था की गई। इसके बावजूद नियमों की अनदेखी कर एक के बाद एक खदानें आवंटित की जा रही हैं यह भी पर्यावरण स्वीकृति के नियमों का खुला उल्लंघन है। कंपनी और पुलिस गठबंधन इस कदर दबाव बनाया जा रहा है कि ग्रामीण किसी भी हाल में पूर्वजों से जीते खाते चले आ रहे अपनी और अपने जल जंगलों को उद्योगपतियों को सौंप दे और गांव खाली कर अन्यत्र चले जाएं। बिना किसी ठोस पुनर्वास उचित मुआवजा की कोई रणनीति नहीं है जिसका ग्रामीण विरोध कर रहे हैं। इन तमाम बिंदुओं पर स्वतंत निष्पक्ष न्यायिक जांच हो जिसमे सबकुछ स्पष्ट हो जाएगा।

धरने के दौरान पुलिस कार्रवाई पर सवाल/-

प्रेस ब्रीफ में बताया गया कि 26 दिसंबर 2025 को धरनास्थल से ट्रकों को बिना ग्रामीणों से बातचीत किए ओडिशा बॉर्डर की ओर भेजा गया। 27 दिसंबर की सुबह भारी पुलिस बल की मौजूदगी में कई ट्रकों को पुलिस संरक्षण में निकालने का प्रयास हुआ, इसी दौरान भारी वाहनों की रफ्तार की चपेट में एक बुजुर्ग ग्रामीण के गंभीर रूप से घायल हो गया इसी दौरान पुलिस की भूमिका की ग्रामीणों के प्रति सहानुभूति की जगह प्रशासनिक रौब से तनाव बढ़ा और इसी दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच लाठीचार्ज और झड़प की स्थिति बनी।

संस्था ने आरोप लगाया कि इसी अफरा-तफरी के बीच एक महिला आरक्षक के साथ अभद्रता की घटना को आंदोलन को बदनाम करने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया, जबकि इस मामले में जिन दो निर्दोष छात्रों कीर्ति श्रीवास और विवेक खुसरो को गिरफ्तार किया गया। वे घटना के समय मौके पर मौजूद ही नहीं थे। उनके खिलाफ लगातार दबाव और धमकी दिए जाने का भी आरोप लगाया गया।

फर्जी मामलों और पुलिस भूमिका पर गंभीर प्रश्न
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने कहा कि 8 दिसंबर 2025 को ग्राम सभा में दिए गए प्रस्ताव और 12 जनवरी 2026 को ग्रामीणों द्वारा की गई शिकायत के बावजूद अब तक कोई FIR दर्ज नहीं की गई। वहीं 27 दिसंबर की घटना को लेकर दर्ज मामलों में पुलिस की भूमिका स्वयं संदेह के घेरे में है, इसलिए निष्पक्ष जांच केवल न्यायिक अधिकारी द्वारा ही संभव है।

प्रेस वार्ता के अंत में संस्था ने प्रशासन के समक्ष प्रमुख मांगें रखीं—

गारे पेलमा सेक्टर-1 का जिंदल कंपनी को दिया गया कोयला खदान आवंटन तत्काल निरस्त किया जाए।

12 जनवरी 2026 की ग्रामीण शिकायत पर FIR दर्ज की जाए।

8 दिसंबर 2025 की ग्राम सभा और 27 दिसंबर 2025 की घटना की निष्पक्ष न्यायिक जांच कराई जाए।

सीताराम रिवर जैसी संदिग्ध घटनाओं में जिम्मेदार पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई हो और ट्रकों मालिकों पर FIR दर्ज की जाए।

महिला आरक्षक से जुड़े मामले की उच्चस्तरीय जांच कर निर्दोष गिरफ्तार युवकों को तत्काल रिहा किया जाए।

आंदोलन में शामिल किसी भी ग्रामीण या कार्यकर्ता को परेशान न किया जाए।

संस्था ने चेतावनी दी कि यदि इन गंभीर मुद्दों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा और प्रशासन की जवाबदेही तय करने के लिए कानूनी व जनांदोलनात्मक कदम उठाए जाएंगे।

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