Thursday, August 27, 2026
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विकसित भारत का सपना और बजट की ज़मीनी हकीकत…..2047 की परिकल्पना में उलझा बजट, आज की चुनौतियों पर अधूरा फोकस ….घोषणाएँ बहुत पर रोज़गार-महँगाई-किसानों पर ठोस रोडमैप नदारद -गणेश कच्छवाहा

 

 

रायगढ़।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन द्वारा प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026–27 को सरकार ने “विकसित भारत@2047” की महत्वाकांक्षी अवधारणा से जोड़ा है। बजट में दीर्घकालिक विकास की बड़ी बातें और आकर्षक शब्दावली ज़रूर दिखाई देती है, लेकिन जब इसे मौजूदा आर्थिक हालात—रोज़गार संकट, बढ़ती महँगाई, किसानों की आय, सामाजिक सुरक्षा और वैश्विक अस्थिरता—की कसौटी पर कसा जाता है, तो कई सवाल खड़े होते हैं। यह बजट उम्मीदों और हकीकत के बीच खड़े उस अंतर को उजागर करता है, जहाँ दृष्टि तो बड़ी है, लेकिन ज़मीनी स्पष्टता और ठोस कार्ययोजना की कमी साफ़ नज़र आती है।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन द्वारा प्रस्तुत वर्ष 2026–27 का केंद्रीय बजट दीर्घकालिक दृष्टि और तात्कालिक चुनौतियों के बीच संतुलन स्थापित करने की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। यह उनका नौवाँ बजट है, जो निरंतरता का संकेत देता है, परंतु किसी भी बजट की वास्तविक शक्ति उसके क्रियान्वयन और नीति की स्पष्टता में निहित होती है।

सरकार ने इस बजट को “विकसित भारत@2047” की परिकल्पना से जोड़ा है। यह दृष्टि प्रेरक अवश्य है।जब सरकार ही पाँच साल के लिए होती है तब 2047 की कार्ययोजना अपने आप में व्यर्थ अर्थात् अर्थ हीन प्रतीत होती है। शेयर मार्केट निफ्टी और सेंसेक्स का गिरना अर्थव्यवस्था की और ही तस्वीर बता रही है। लेकिन इसके साथ ही वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों—रोज़गार, महँगाई, कृषि आय, सामाजिक सुरक्षा और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता—पर केंद्रित ठोस, समयबद्ध नीतिगत खाका अपेक्षित था।जो दृष्टिगत नहीं होता।

बजट में राजकोषीय घाटा 4.3% रहने का अनुमान तथा पूंजीगत व्यय को लगभग ₹12.2 लाख करोड़ तक बढ़ाना अवसंरचना निवेश के पक्ष में सकारात्मक संकेत है। यह दीर्घकालिक विकास क्षमता को मज़बूत कर सकता है। फिर भी यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन व्ययों से प्रत्यक्ष रोजगार सृजन और आय वृद्धि किस हद तक होती है।

घोषणाओं में करदाताओं, किसानों, निवेशकों और उद्योगों के लिए अनेक प्रावधान शामिल किए गए हैं। किंतु आर्थिक विश्लेषण का मुख्य प्रश्न यह है कि पिछली घोषणाओं का क्रियान्वयन किस स्तर तक सफल रहा, और क्या नई घोषणाएँ भी उसी गति से लागू हो पाएँगी।यह आंकलन बहुत आवश्यक है।

बाजार सूचकांकों में उतार–चढ़ाव को व्यापक आर्थिक संकेतक का अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता, परंतु निवेशक मनोभाव यह अवश्य दर्शाते हैं कि नीति पर भरोसा स्थिर और पूर्वानुमेय होना चाहिए।
समीक्षात्मक दृष्टि से देखा जाए तो बजट की भाषा में विकास, समावेशन और आत्मनिर्भरता की बात है, परंतु रोज़गार सृजन, महँगाई नियंत्रण, शिक्षा–स्वास्थ्य निवेश, कृषि सुधार और सामाजिक सुरक्षा तंत्र पर अधिक स्पष्ट, क्षेत्रवार कार्ययोजना अपेक्षित थी।
यदि विकास का लाभ व्यापक सामाजिक आधार तक नहीं पहुँचता, तो आय असमानता बढ़ने की आशंका बनी रहती है। ऐसे में समावेशी विकास की अवधारणा केवल नारे तक सीमित न रहकर, ठोस योजनाओं और परिणामों में दिखाई देनी चाहिए।

इस तरह से यह बजट दिशा हीन दिखायी पड़ता है।कल्पना,सपना,तथा शब्द बहुत अच्छे हैं।परंतु इसमें विकास, रोजगार, आत्मनिर्भरता,मंहगाई, गरीबी कम करना,किसानों ,छात्रों,युवाओ,सामाजिक कल्याण की योजनाओं,मुद्रास्फीति,,गिरते रूपयों की समस्या और वैश्विक चुनौतियों से निपटने पर कोई स्पष्ट नीतिगत रूपरेखा दिखाई नहीं देती है।फिर वही पुराना राग अपनाया गया उद्योग कॉरपोरेट पूंजी पतियों को रियायत देकर लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई। 85 करोड़ आबादी के लिए अभी भी कोई ठोस निर्णायक नीति स्पष्ट नहीं है।इससे अमीर और ग़रीब के बीच खाई और अधिक बढ़ेगी।सबका साथ सबका विकास की जगह एक अमीरों का भारत और दूसरा गरीबों का भारत की दिशा में आगे बढ़ता प्रतीत हो रहा है,जो काफ़ी चिंताजनक है।

गणेश कछवाहा
लेखक, चिंतक एवं समीक्षक
रायगढ़, छत्तीसगढ़
gp.kachhwaha@gmail.com

 

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