Saturday, June 13, 2026
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ईद का चाँद और भूख की सच्चाई: इंसानियत की तलाश में एक मार्मिक पुकार…..यह कविता सवाल उठाती है कि जब झोपड़ियों में चूल्हे ठंडे हों और बच्चों के चेहरे उदास हों…तब ईद का असली मायना क्या है….और हमें उस खोए हुए ‘चाँद’ यानी इंसानियत को फिर से तलाशना होगा…पढ़ें गणेश कछवाहा कृत ये कविता

 

*ईद मुबारक हो*
*“ईद का चाँद कहाँ खो गया है?”*

मैं भी
ईद की मुबारकबाद देना चाहता हूँ—
पर बताइए,
किसेऔर कैसे
गले लगाऊँ मैं?

जब एक माँ
अपने भूखे बच्चे को देखकर
चुपचाप
आँचल भीगाती है,
झोपड़ियों में
चूल्हा
आज भी ठंडा पड़ा है।
आखिर –
किसने चुरा लिया है
मेरे देश का चाँद?

बिखरे सामानों के बीच
धूल और मिट्टी में सना
एक मासूम बच्चा
अपने ही भविष्य से खेल रहा है।
दरकी हुई दीवार से
लिपटकर रोती माँ
कभी अपने भूखे बच्चे को देखती है,
कभी
बुझे चूल्हे
और खाली बर्तनों को।

बताइए—
ऐसी दुनिया में
कोई कैसे
मना सकता है
ईद?

चाँद तो
स्नेह, मिलन
और इंसानियत का प्रतीक है।
वह तो झोपड़ी और महल
दोनों पर
समान रूप से चमकता है।
फिर यह कैसा अँधेरा है ?
जो इंसान को
इंसान से अलग कर रहा है?
किसने
स्वाति की बूँदों में
अमृत की धार में
ज़हर घोल दिया?

किसने
हाथों में
गुलाब,इत्र
हल, कुदाली
कलम और किताब की जगह
बंदूक और गोलियाँ
थमा दीं?

दोस्तों,
अब जागना होगा।
ढूँढकर
उस चाँद को
फिर से
झोपड़ियों तक लाना होगा।

जिस दिन
हर झोपड़ी में
किलकारियाँ गूँजेंगी,
बच्चों के चेहरों पर
मुस्कान खिलेगी,
माँ का आँचल
खुशियों से लहराएगा—
उसी दिन
सचमुच
ईद होगी।।

याद रखिए—
ईद केवल चाँद देखने से नहीं आती।
ईद
तब आती है
जब किसी भूखे बच्चे के चेहरे पर
मुस्कान खिलती है।

ईद तब आती है
जब किसी माँ का आँचल
आँसुओं से नहीं,
खुशियों से भीगता है।
और ईद तब आती है
जब इंसान
धर्म से पहले
इंसानियत को पहचानता है।।

जिस दिन
हर झोपड़ी में मुस्कान,
किलकारियां,
हँसी गूँजेगी—
मां का आँचल
खुशियों से झूमकर
लहरायेगा
अमन,चैन और
सुकून होगा
उस दिन
सचमुच
चाँद निकलेगा।
ईद होगी।
ईद मुबारक हो।।

गणेश कछवाहा
चिंतक, लेखक एवं समीक्षक
रायगढ़, छत्तीसगढ़।
gp.kachhwaha@gmail.com

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