Monday, October 12, 2026
Homeआम मुद्देसबसे ज्यादा जिज्ञासा जगाने वाला... पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ..? —मुक्तिबोध...

सबसे ज्यादा जिज्ञासा जगाने वाला… पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ..? —मुक्तिबोध का 60 साल पुराना सवाल…. जिसका जवाब आज भी आसान नहीं…अंधेरे के पार तक …लेखक चिंतक इस तरह से पाठकों के समक्ष गजानन माधव मुक्तिबोध के …

 

 

 

 

 

गजानन माधव मुक्तिबोध : एक ऐसे कवि की तलाश, जो अपने समय से ही नहीं, अपने भीतर के अँधेरे से भी लड़ता रहा ।
कुछ कवि अपने समय का चित्र बनाते हैं, कुछ उसकी व्याख्या करते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो अपने समय के चेहरे से मुखौटा उतार देते हैं। गजानन माधव मुक्तिबोध इसी तीसरी श्रेणी के कवि हैं। वे केवल हिन्दी की नई कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय मनुष्य की चेतना, उसके अंतर्विरोध, उसकी नैतिक दुविधा और उसके सामाजिक उत्तरदायित्व की सबसे बेचैन पड़ताल करने वाले रचनाकारों में हैं।
मुक्तिबोध को पढ़ना आसान नहीं है। उनकी कविता सरल भावुकता का आश्रय नहीं देती। वह पाठक को अपने साथ अँधेरी गलियों, सुनसान बावड़ियों, खंडहरों, भयावह आकृतियों, स्वप्न और फैंटेसी की दुनिया में ले जाती है और फिर अचानक उसे उसके अपने समय के सामने खड़ा कर देती है।

शायद इसीलिए मुक्तिबोध को पढ़ने के लिए केवल साहित्यिक रुचि पर्याप्त नहीं; आत्मालोचन का साहस भी चाहिए।और उनकी इसी बेचैन चेतना को एक छोटा-सा प्रश्न असाधारण तीव्रता से व्यक्त करता है—
पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?”
यह मुक्तिबोध का ऐसा चर्चित प्रश्न है जिसे बाद की साहित्यिक दुनिया ने एक प्रतीक की तरह याद रखा है। नामवर सिंह ने मुक्तिबोध के मूल्यांकन के संदर्भ में इसी कथन को ‘कलमकारों के बीच एक मशाल’ की तरह प्रज्वलित बताया था। यह प्रश्न केवल राजनीति का प्रश्न नहीं है। यह व्यक्ति की सामाजिक पक्षधरता, नैतिक प्रतिबद्धता और अपने समय के प्रति उसकी जिम्मेदारी का प्रश्न है।

 

*जन्म से मृत्यु तक संघर्ष :
13 नवंबर 1917 को श्योपुर में जन्मे मुक्तिबोध का जीवन निरंतर संघर्षों से घिरा रहा। उनके पिता पुलिस विभाग में थे और स्थानांतरण के कारण बाल्यकाल में उनकी शिक्षा कई स्थानों पर हुई। जीवन में आर्थिक कठिनाइयाँ रहीं, नौकरी के अनेक पड़ाव आए और अध्यापन, पत्रकारिता तथा साहित्य-सृजन के बीच उनका जीवन चलता रहा।
बीस वर्ष की आयु में उन्होंने अध्यापन से जीवन-यात्रा शुरू की। बाद में विभिन्न नगरों में अध्यापन और पत्रकारिता का काम किया। 1958 में राजनांदगाँव के दिग्विजय महाविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति उनके जीवन का अपेक्षाकृत स्थिर दौर था। इसी काल में उनकी कुछ महत्त्वपूर्ण रचनात्मक उपलब्धियाँ सामने आईं।
लेकिन मुक्तिबोध के जीवन को केवल आर्थिक संघर्ष की कहानी बनाना उनके महत्त्व को कम करना होगा। उनका असली संघर्ष था—सत्य को पहचानने और उसके पक्ष में खड़े होने के बीच की दूरी को समाप्त करना।यही संघर्ष उनकी कविता में बार-बार लौटता है।
*11 सितंबर 1964 को मात्र 46 वर्ष की आयु में नई दिल्ली में उनका निधन हो गया। अल्प जीवन, लेकिन असाधारण रचनात्मक ताप ,असीमित क्षितिज —मुक्तिबोध की सबसे पहली पहचान यही है।*

आत्मसंघर्ष उनकी रचनात्मकता का केंद्रीय तत्व है –
मुक्तिबोध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे बाहर के समाज को देखने से पहले स्वयं को कठघरे में खड़ा करते हैं। उनके यहाँ सामाजिक आलोचना केवल दूसरों के लिए नहीं है। कवि अपने भीतर के भय, सुविधा, समझौते, निष्क्रियता और बौद्धिक आत्ममुग्धता को भी उसी कठोरता से देखता है।
यही कारण है कि उनकी कविता में ‘मैं’ महज निजी व्यक्ति नहीं रह जाता। वह एक ऐसे मध्यवर्गीय मनुष्य का प्रतिनिधि बन जाता है जो अन्याय को पहचानता है, उससे असहमत भी है, लेकिन अपने सामाजिक और आर्थिक हितों, भय और सुविधाओं के कारण निर्णायक प्रतिरोध तक पहुँचने में बार-बार असफल होता है।
मुक्तिबोध का यह आत्मसंघर्ष उनकी रचनात्मकता का केंद्रीय तत्व है। वे जिस सामाजिक यथार्थ को देखते हैं, उसकी आलोचना करते हुए स्वयं को भी उससे अलग कोई निष्कलंक नैतिक सत्ता नहीं मानते। यही उनकी ईमानदारी है और यही उनकी आधुनिकता।

*‘अँधेरे में’ : एक कविता से कहीं अधिक*

मुक्तिबोध की सर्वाधिक चर्चित लंबी कविता ‘अँधेरे में’ को केवल कठिन कविता मानकर छोड़ देना उसके अर्थ-संसार को सीमित कर देना होगा। यह कविता आधुनिक मनुष्य की चेतना, भय, राजनीतिक-सामाजिक यथार्थ, बौद्धिक दुविधा और नैतिक असफलता की जटिल यात्रा है।

यहाँ ‘अँधेरा’ केवल रात या निराशा का प्रतीक नहीं है। वह सामाजिक संरचनाओं का अँधेरा है, सत्ता और शोषण का अँधेरा है, आत्मवंचना का अँधेरा है और उस विवेक-संकट का अँधेरा भी है जिसमें मनुष्य सही को पहचानते हुए भी उसके पक्ष में खड़ा होने का साहस नहीं जुटा पाता।

इसलिए मुक्तिबोध को पढ़ना अपने समय के बाहर जाकर किसी पुराने कवि को पढ़ना नहीं है। बल्कि उनके माध्यम से अपने भीतर और अपने आसपास के उस अँधेरे को पहचानना है जिसे हम अक्सर सामान्य मानकर स्वीकार कर लेते हैं।

*ब्रह्मराक्षस’ : ज्ञान की विडम्बना*
मुक्तिबोध के ‘ब्रह्मराक्षस’ का बिंब हिन्दी कविता के सबसे प्रभावशाली प्रतीकों में है। ज्ञान से सम्पन्न, आत्मचेतस और बौद्धिक व्यक्ति जब अपने ज्ञान को जीवन और समाज से जोड़ने में असफल हो जाता है, तब वही ज्ञान उसके लिए मुक्ति का माध्यम बनने के बजाय एक प्रकार का आत्मदंड बन सकता है।
यह कविता केवल किसी विद्वान की कथा नहीं है। यह उस बौद्धिक वर्ग की आलोचना भी है जो ज्ञान तो अर्जित करता है, पर उसे सामाजिक परिवर्तन और मानवीय सरोकार से जोड़ने का जोखिम नहीं उठाता।
मुक्तिबोध स्वयं ज्ञान को संवेदना से अलग करके नहीं देखते। उनकी आलोचना-दृष्टि में ‘ज्ञानात्मक संवेदना’ और ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ की अवधारणा इसी व्यापक रचनात्मक दर्शन की ओर संकेत करती है।
इस अर्थ में ‘ब्रह्मराक्षस’ आज भी हमारे विश्वविद्यालयों, बौद्धिक संस्थानों, साहित्यिक संसार और सार्वजनिक जीवन में दिखाई देने वाली उस विडम्बना का प्रतीक बन सकता है जिसमें ज्ञान बहुत है, लेकिन सामाजिक उत्तरदायित्व कम।

*फैंटेसी नहीं, यथार्थ का गहरा रूप*
मुक्तिबोध की कविता की एक विशिष्ट विशेषता उसका फैंटेसी-शिल्प है। पहली दृष्टि में उनके यहाँ विचित्र दृश्य, भयावह आकृतियाँ, रहस्यमय गलियाँ, अँधेरे, राक्षसी बिंब और स्वप्न जैसे दृश्य दिखाई देते हैं। लेकिन यह पलायनवादी कल्पना नहीं है।
वास्तव में मुक्तिबोध ने जिस सामाजिक यथार्थ को देखा, उसकी जटिलता को व्यक्त करने के लिए पारंपरिक यथार्थवादी भाषा उन्हें अपर्याप्त लगती है। इसलिए यथार्थ उनकी कविता में फैंटेसी का रूप ग्रहण करता है। उनके यहाँ कल्पना यथार्थ से बचने का रास्ता नहीं, बल्कि यथार्थ की भीतरी परतों तक पहुँचने का माध्यम है। (हिन्दवी)
इसी कारण उनकी कविता को केवल घटनाओं या दृश्यों के स्तर पर पढ़ना पर्याप्त नहीं। उसके प्रतीकों और फैंटेसी के पीछे छिपी सामाजिक संरचना को पहचानना पड़ता है।

*कठिन भाषा : कमजोरी या रचनात्मक आवश्यकता?*
मुक्तिबोध पर सबसे सामान्य आरोप उनकी ‘दुरूहता’ को लेकर रहा है। उनकी लंबी पंक्तियाँ, जटिल वाक्य-विन्यास, अप्रत्याशित बिंब, संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के साथ बोलचाल और लोकानुभव की भाषा का मेल—इन सबके कारण उनकी कविता तत्काल सहज नहीं खुलती।
लेकिन प्रश्न यह भी है कि क्या जटिल यथार्थ को हमेशा सरल भाषा में व्यक्त किया जा सकता है?
मुक्तिबोध की भाषा उनके अनुभव की जटिलता से पैदा होती है। मराठी भाषिक संरचना के प्रभाव, हिन्दी की विभिन्न परतों के प्रयोग और लंबे वाक्य-विन्यास ने उनकी कविता को विशिष्ट रूप दिया। स्वयं उनकी कविता में विचार और संवेदना एक-दूसरे में इस तरह गुंथते हैं कि भाषा कभी-कभी विचार की गति का अनुसरण करती हुई दिखाई देती है। NCERT भी उनकी कविता की इसी भावनात्मक और विचारात्मक ऊर्जा तथा लंबे वाक्य-विन्यास की ओर संकेत करता है।
इसलिए मुक्तिबोध की कठिनाई को केवल दोष मानना उचित नहीं। वह उनकी काव्य-भाषा की चुनौती भी है और उपलब्धि भी।

*कवि के साथ आलोचक भी*
मुक्तिबोध का महत्त्व केवल कविता में नहीं है। उन्होंने आलोचना को भी रचनात्मक कर्म की तरह देखा। ‘कामायनी : एक पुनर्विचार’, ‘नई कविता का आत्मसंघर्ष’, ‘नये साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’, ‘समीक्षा की समस्याएँ’ और ‘एक साहित्यिक की डायरी’ जैसी कृतियाँ हिन्दी आलोचना में उनकी स्वतंत्र वैचारिक पहचान स्थापित करती हैं।
उनके लिए साहित्य सौंदर्य का निष्क्रिय उपभोग नहीं था। साहित्य मनुष्य के जीवन, समाज, इतिहास और चेतना से जुड़ा हुआ कर्म था। वे रचना के पीछे काम करने वाली जीवन-दृष्टि को समझने पर जोर देते हैं।
यहीं मुक्तिबोध की आलोचना आज भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। वे हमें यह प्रश्न पूछने के लिए विवश करते हैं कि साहित्य केवल सुंदर क्यों हो, वह सत्य के प्रति उत्तरदायी क्यों न हो? लेखक केवल कुशल क्यों हो, वह अपने समय के प्रति नैतिक रूप से जवाबदेह क्यों न हो?

*मार्क्सवाद और मुक्तिबोध*
मुक्तिबोध के साहित्य को समझते समय उनके मार्क्सवादी वैचारिक झुकाव की उपेक्षा नहीं की जा सकती। लेकिन उन्हें केवल ‘मार्क्सवादी कवि’ कह देना भी उनके साहित्य को छोटा कर देना होगा।
उनका मार्क्सवाद किसी राजनीतिक नारे की तरह नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ को समझने की एक आलोचनात्मक दृष्टि के रूप में उपस्थित है। वर्ग-विभाजन, शोषण, असमानता, सत्ता-संबंध और मध्यवर्गीय चेतना के अंतर्विरोध उनके साहित्य में बार-बार आते हैं।
परंतु वे मनुष्य को किसी तैयार वैचारिक साँचे में बंद नहीं करते। उनकी सबसे बड़ी चिंता मनुष्य की चेतना है—वह चेतना जो अपने समय की संरचनाओं से निर्मित भी होती है और उनका प्रतिरोध करने की क्षमता भी रखती है।
इसीलिए मुक्तिबोध का साहित्य वैचारिक होने के बावजूद घोषणापत्र नहीं बनता। उसमें विचार अनुभव से पैदा होता है और अनुभव आत्मसंघर्ष से।

चाँद का मुँह टेढ़ा है’ : सौंदर्य की नई दृष्टि
1964 में प्रकाशित ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ मुक्तिबोध के जीवनकाल में प्रकाशित उनका प्रमुख काव्य-संग्रह था। ‘भूरी-भूरी खाक धूल’ का प्रकाशन बाद में हुआ। उनकी अनेक रचनाएँ मरणोपरांत व्यापक रूप से सामने आईं।
‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ शीर्षक ही मुक्तिबोध की सौंदर्य-दृष्टि को समझने की कुंजी है। परंपरागत कविता में चाँद सौंदर्य, शीतलता और रोमानी आकर्षण का प्रतीक रहा है; मुक्तिबोध के यहाँ वही चाँद ‘टेढ़ा’ है।
यह टेढ़ापन केवल सौंदर्य-बोध का परिवर्तन नहीं, बल्कि यथार्थ के प्रति दृष्टि-परिवर्तन है। जब समाज टेढ़ा है तो कविता का चाँद भी सीधा और सुंदर कैसे रह सकता है?
मुक्तिबोध ने कविता को सजावटी सौंदर्य से निकालकर जीवन की कुरूपताओं, भयावहताओं और अंतर्विरोधों के बीच खड़ा किया। उनके यहाँ सौंदर्य सत्य से अलग कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है।

*जीवन और रचना के बीच कोई दीवार नहीं*
मुक्तिबोध के जीवन में आर्थिक अभाव, नौकरी की अस्थिरता, वैचारिक संघर्ष और साहित्य के प्रति अडिग प्रतिबद्धता साथ-साथ चलते रहे। राजनांदगाँव का समय उनके जीवन और साहित्य में विशेष महत्त्व रखता है।
उनकी रचनात्मकता का एक बड़ा स्रोत यही जीवन-संघर्ष था। उन्होंने जिस मध्यवर्गीय संकट को लिखा, उसे बाहर से देखकर नहीं लिखा; उसका एक हिस्सा उन्होंने स्वयं जिया था।
इसलिए मुक्तिबोध के यहाँ आत्मकथात्मकता भी एक व्यापक सामाजिक अर्थ ग्रहण करती है। उनका ‘मैं’ निजी जीवन का अकेला व्यक्ति नहीं है; वह अपने समय के मनुष्य की सामूहिक बेचैनी का वाहक बन जाता है।

*“पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?” : मुक्तिबोध का असुविधाजनक प्रश्न*

मुक्तिबोध की वैचारिक चेतना को समझने वाला अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। सीधे सत्ता, शोषण, न्याय और अपने समय के प्रति व्यक्ति की वास्तविक पक्षधरता** से था।मुक्तिबोध की वैचारिक दुनिया को समझने के लिए उनका एक अत्यंत चर्चित प्रश्न बार-बार सामने आता है—“पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?”

यह प्रश्न जितना सहज सुनाई देता है, उतना ही गहरा और असुविधाजनक है। मुक्तिबोध के यहाँ ‘पॉलिटिक्स’ का आशय केवल किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध से नहीं है। यह प्रश्न व्यक्ति की सामाजिक स्थिति, वर्गीय चेतना, नैतिक प्रतिबद्धता और अपने समय के अन्याय के प्रति उसकी वास्तविक भूमिका को सामने लाता है।
मुक्तिबोध जैसे कवि के लिए राजनीति जीवन से अलग कोई गतिविधि नहीं थी। मनुष्य किसके पक्ष में खड़ा है, किसके दुःख को अपना दुःख मानता है, किस अन्याय पर चुप रहता है और किन सुविधाओं के लिए अपने विवेक से समझौता करता है—इन सभी प्रश्नों में राजनीति अंतर्निहित है।
इसीलिए “पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?” को मुक्तिबोध की समूची रचनात्मक चेतना की एक तरह की कसौटी माना जा सकता है। वे लेखक से पूछते हैं कि उसकी संवेदना का सामाजिक पक्ष क्या है और उसकी बौद्धिकता किसके जीवन-संघर्ष से जुड़ी है।
यह प्रश्न आज और भी प्रासंगिक हो उठा है। सार्वजनिक जीवन में विचारधारात्मक पहचानें स्पष्ट हैं, लेकिन व्यक्तिगत नैतिक पक्षधरता कई बार धुंधली पड़ जाती है। सत्ता, बाजार, संस्थागत दबाव और सामाजिक प्रतिष्ठा के बीच व्यक्ति के लिए अपने विवेक के साथ खड़ा होना कठिन होता जा रहा है। ऐसे समय में मुक्तिबोध का यह प्रश्न किसी पुराने साहित्यिक संवाद का हिस्सा भर नहीं रह जाता; वह हमारे सामने खड़ा एक जीवित नैतिक प्रश्न बन जाता है—

पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?”
अन्याय के साथ खड़े होकर मौन रहने वालों के साथ, या उसके विरुद्ध संघर्षरत मनुष्य के साथ?अर्थात् तुम किसके साथ हो?
मुक्तिबोध की विशेषता यह है कि वे यह सवाल दूसरों से पूछकर स्वयं को उससे मुक्त नहीं करते। उनकी कविता का सबसे बड़ा साहस यही आत्मालोचन है कि वे अपने भीतर के मध्यवर्गीय भय, सुविधा, कमजोरी और समझौते को भी कठघरे में खड़ा करते हैं। इसलिए उनकी राजनीति बाहर की दुनिया की आलोचना जितनी है, उतनी ही स्वयं की चेतना की कठोर पड़ताल भी है।

यहीं मुक्तिबोध का साहित्य अपने समय से आगे निकल जाता है। वे हमें किसी तैयार राजनीतिक उत्तर की ओर नहीं धकेलते; वे हमें अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए विवश करते हैं। उनकी कविता का प्रश्न अंततः यही है कि क्या हमारी संवेदना हमारे विवेक के साथ खड़ी है और क्या हमारा विवेक हमारे कर्म का मार्गदर्शन करता है?
इस अर्थ में “पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?” मुक्तिबोध के साहित्य का केवल एक यादगार वाक्य नहीं, बल्कि उनकी समूची रचना-दृष्टि का प्रवेश-द्वार है।

*मुक्तिबोध की प्रासंगिकता : आज और अधिक*

मुक्तिबोध की मृत्यु को छह दशक से अधिक समय बीत चुका है। फिर भी उनकी प्रासंगिकता कम होने के बजाय बढ़ी है।
आज सूचना का विस्तार अभूतपूर्व है, लेकिन सूचना और विवेक एक ही चीज नहीं हैं। आज शिक्षित और बौद्धिक समाज पहले से बड़ा है, लेकिन ज्ञान और सामाजिक उत्तरदायित्व का संबंध उतना ही जटिल है। लोकतांत्रिक संस्थाएँ मौजूद हैं, पर नागरिक चेतना के सामने अनेक प्रकार के दबाव हैं। आर्थिक विकास के साथ असमानता, उपभोग की संस्कृति के साथ अकेलापन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ आत्म-सेंसरशिप के प्रश्न भी हमारे सामने हैं।
ऐसे समय में मुक्तिबोध का सबसे बड़ा प्रश्न हमारे सामने फिर खड़ा होता है—मनुष्य अपने समय के अन्याय को पहचानने के बाद उसके विरुद्ध कितना खड़ा होता है?उनका साहित्य हमें सुविधा और सत्य के बीच चुनाव करने के लिए विवश करता है।

यही कारण है कि मुक्तिबोध को केवल साहित्य के इतिहास में रख देना उनके साथ अन्याय होगा। वे हमारे वर्तमान के भी कवि हैं।

मुक्तिबोध : एक अधूरा कार्य, जो अब भी जारी है

मुक्तिबोध का जीवन अल्प था, लेकिन उनकी रचनात्मक आकांक्षा विराट। उनकी कविता में बार-बार एक अधूरे कार्य को पूरा करने की बेचैनी दिखाई देती है। शायद यही कारण है कि उनके साहित्य में ‘अपूर्णता’ भी एक सकारात्मक नैतिक ऊर्जा बन जाती है।

वे पूर्ण उत्तर देने वाले कवि नहीं हैं। वे प्रश्नों को अधिक गहरा करने वाले कवि हैं।उनका महत्त्व इस बात में नहीं कि उन्होंने हमारे लिए सारे उत्तर खोज दिए; बल्कि इस बात में है कि उन्होंने हमें अपने भीतर झाँकने, अपने समय को पहचानने और अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बचने की कोशिशों को पकड़ने की दृष्टि दी।

मुक्तिबोध का ‘अँधेरा’ इसलिए निराशा का अंतिम अँधेरा नहीं है। उसके भीतर एक बेचैन खोज है—एक ऐसी रोशनी की खोज जो बाहर से नहीं आती, बल्कि मनुष्य की आत्मालोचनात्मक चेतना से पैदा होती है।आज जब साहित्य से भी त्वरित निष्कर्ष, आसान विचार और सुविधाजनक पक्षधरता की अपेक्षा बढ़ रही है, मुक्तिबोध हमें कठिन रास्ता चुनने की चुनौती देते हैं।
अपने भीतर के अँधेरे को पहचानो।अपने समय के अँधेरे को पहचानो।और फिर तय करो कि तुम उसके दर्शक हो, उसके लाभार्थी हो या उसके विरुद्ध खड़ा होने वाले मनुष्य।यही मुक्तिबोध की सबसे बड़ी साहित्यिक विरासत है।

और शायद इसी अर्थ में मुक्तिबोध आज भी हमारे बीच जीवित हैं—एक कविता की तरह नहीं, बल्कि एक असुविधाजनक प्रश्न की तरह।मुक्तिबोध इसलिए केवल हिन्दी कविता के इतिहास का एक अध्याय नहीं हैं।वे हमारी चेतना में लगा हुआ एक प्रश्नचिह्न हैं।वे उस अँधेरे में जलती हुई बेचैन मशाल हैं, जिसकी रोशनी आँखों को सुख नहीं देती—बल्कि उन चेहरों को दिखा देती है जिन्हें हम देखना नहीं चाहते।

उनका ‘अँधेरा’ निराशा का अंतिम अँधेरा नहीं है। वह खोज का अँधेरा है। उसके भीतर एक ऐसी रोशनी की तलाश है जो बाहर से थोपे गए प्रकाश से नहीं, आत्मालोचन, विवेक, संवेदना और सामाजिक प्रतिबद्धता से पैदा होती है।

और इसीलिए मुक्तिबोध आज भी हमारे बीच हैं—एक कवि की तरह नहीं,एक आलोचक की तरह नहीं,एक विचारधारा की तरह भी नहीं—बल्कि एक ऐसे जीवित प्रश्न की तरह,जिससे बचकर निकल जाना आसान नहीं है।“पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?”शायद मुक्तिबोध को पढ़ने की शुरुआत इसी प्रश्न से होती है।और शायद उनका साहित्य हमें अंततः वहीं ले जाता है जहाँ यह प्रश्न हमारे सामने नहीं, हमारे भीतर खड़ा हो जाता है।

गणेश कछवाहा
चिंतक,लेखक एवं समीक्षक
काशीधाम
रायगढ़,छत्तीसगढ़ ।
gp.kachhwaha @gmail.com

RELATED ARTICLES

एयरटेल दे रहा है सभी पोस्टपेड प्लान्स पर मुफ़्त अंतर्राष्ट्रीय रोमिंग….एयरटेल ने अनलिमिटेड डेटा…. फास्ट लेन टेक्नोलॉजी….सुरक्षा सुविधाओं और मनोरंजन के साथ नए पोस्टपेड...

        नई दिल्ली। भारत की प्रमुख दूरसंचार सेवा प्रदाताओं में से एक भारती एयरटेल (एयरटेल) ने आज नए पोस्टपेड प्लान लॉन्च करने की घोषणा की है,...

सेवांजली ने दिया गांधी – शास्त्री जयंती पर सेवा, सम्मान और हरियाली का संदेश …जन्मदिन की खुशियों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ा…सर्वहारा व्यक्तियों का...

        रायगढ़। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती के अवसर पर लीनस क्लब सेवांजली के द्वारा सेवा, सम्मान और...

पूरी में स्मिधा रवानी ने बिखेरा कथक की छटा राष्ट्रीय ब्रह्मा फेस्टिवल में हासिल किया प्रथम स्थान…रायगढ़ घराने की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को ओडिशा...

रायगढ़। राजा चक्रधर सिंह की सांस्कृतिक विरासत और रायगढ़ घराने के कथक की विशिष्ट पहचान को ओडिशा की धरा पर गौरवान्वित करते हुए रायगढ़...

रायगढ़ की रेल सुविधाओं को लेकर चेंबर ने उठाई प्रमुख मांगें ….इन सुधार मांगों और मुद्दों को लेकर चेंबर पदाधिकारियों ने किया मुलाकात और...

      रायगढ़। छत्तीसगढ़ चेंबर ऑफ कॉमर्स, रायगढ़ इकाई ने रायगढ़ के बढ़ते औद्योगिक एवं व्यापारिक महत्व को देखते हुए रेलवे प्रशासन के समक्ष यात्री सुविधाओं...
- Advertisment -spot_img

Most Popular

Recent Comments