Saturday, August 29, 2026
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नौनिहालों के अंधेरे में भविष्य पानी को तरसते राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र बिरहोर….विस्थापन के बाद भी बुनियादी सुविधा नसीब नहीं…. डीएमएफ के करोड़ों खर्च के बावजूद पीने तक का पानी नहीं…राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों को जरूरत है सरकारी संरक्षण की

 

 

रायगढ़।

जिले के कोयला खनन क्षेत्र में रहने वाले राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले बिरहोर आज भी मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं। लगभग 15 परिवारों के करीब 62 बिरहोर विस्थापन के बाद ऐसी जगह जीवन यापन करने को मजबूर हैं, जहां पीने और नहाने तक के लिए पानी उपलब्ध नहीं है। हालात इतने भयावह हैं कि बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को गंदे पानी या दूर-दराज़ से पानी लाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

बताया गया कि कोयला खदान परियोजना के लिए बेहतर जीवन, सुविधाएं और पुनर्वास का सपना दिखाकर इन बिरहोर परिवारों को विस्थापित किया गया था। लेकिन हकीकत में जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) फंड के करोड़ों रुपये होने के बावजूद आज तक इन परिवारों को स्वच्छ पेयजल, आवास और मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल सकीं।

अंधेरे में नौनिहालों का भविष्य

स्थानीय बिरहोरों का कहना है कि छुआछूत और उपेक्षा के कारण उन्हें कचड़ा क्षेत्र में रहने को मजबूर किया गया। लंबे समय तक कोयला खदान की काली और गंदी नालियों के पानी से निस्तारण करते हुए जैसे-तैसे जीवन चला रहे थे, लेकिन अब वह नाला भी सूख चुकी है। पास की केलो नदी का पानी काफी दूर है और गंदगी से भरा होने के कारण उपयोग योग्य नहीं रह गया है।

बिरहोर समुदाय के फूल मेत बिरहोर और कार्तिक बिरहोर ने बताया कि उन्हें तीसरी बार विस्थापित करने की धमकी दी जा रही है, जबकि पहले किए गए पुनर्वास के वादे आज तक कागजों से बाहर नहीं निकल पाए। विस्थापन के नाम पर केवल आश्वासन दिए गए ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है।

बुनियादी सुविधाओं को तरसती बूढ़ी आंखे

एक सामाजिक संगठन द्वारा किए गए अध्ययन में यह गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें साफ तौर पर बताया गया है कि बिरहोर परिवारों को न तो स्थायी जलस्रोत उपलब्ध कराया गया और न ही स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी जरूरी सुविधाएं। अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि शीघ्र हस्तक्षेप नहीं किया गया तो हालात और भयावह हो सकते हैं।

यहां के बिरहोर परिवारों के जीवन की जद्दोजहद जारी है। सवाल यह है कि जिन बिरहोरों को देश का राष्ट्रपति दत्तक पुत्र मानता है, वे आज भी पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए क्यों तरस रहे हैं? देखना यह है कि प्रशासन और शासन इस गंभीर मानवीय संकट पर कब तक आंख मूंदे रहेगा। कोड़केल तमनार हो या रुआँफूल, धरमजयगढ़ हो हर जगह पर साफ़ पानी और मूलभूत सुविधाओ की कमी से जुझ रहे हैं। रुआँफूल में हाथियों की वजह से रात दहशत और अंधेरे के साथ जीवन जीने की मजबूरी है। वहीं दूसरी ओर रात के अन्धेरे में पूरी बिरहोर बस्ती इसलिये नहीं सो रहे हैं की कहीं घर सोते समय भूमिगत कोयला खदान के भीतर समा न जाएँ कोयला खान की वजह से दीवारों में दरारें बढ़ रही है। जरूरत है कि राष्ट्रपति के इन दत्तक पुत्रों के सही पुनर्वास और सुविधाओं की जहां वे सुकून से जीवन जी सकें।

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