Saturday, August 29, 2026
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धर्म महासम्मेलन में पुरोधा प्रमुख का उद्बोधन…..“क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से परे हैं परमपुरुष”….आनन्द मार्ग प्रचारक संघ के पुरोधा प्रमुख आचार्य विश्वदेवानन्द अवधूत ने साधकों एवं भक्तों से कहा …

 

 

 

 

 

आनन्द पूर्णिमा के पावन अवसर पर आयोजित धर्म महासम्मेलन के द्वितीय दिवस के प्रातःकालीन सत्र में आनन्द मार्ग प्रचारक संघ के पुरोधा प्रमुख आचार्य विश्वदेवानन्द अवधूत ने उपस्थित साधकों एवं भक्तों को संबोधित किया।

उन्होंने “ईश्वर और जीव” विषय की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि परमपुरुष क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से सर्वथा परे हैं।


उन्होंने योगदर्शन के सूत्र “क्लेश-कर्म-विपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः” का उल्लेख करते हुए कहा कि ईश्वर अथवा परमपुरुष वह पुरुषविशेष सत्ता है जो क्लेश (मानसिक विकार), कर्म (क्रिया), विपाक (कर्मफल) तथा आशय (संस्कारों के बीज) से कभी प्रभावित नहीं होती। इसके विपरीत संसार का प्रत्येक जीव इन बंधनों के प्रभाव में रहता है।


अपने प्रवचन में उन्होंने स्पष्ट किया कि क्लेश वह तत्व है जो मन की स्वाभाविक शांति और संतुलन को भंग कर देता है। जीव-जगत में विभिन्न प्रकार की वृत्तियाँ कार्य करती हैं, जिनके कारण मनुष्य सुख-दुःख, लाभ-हानि तथा कर्मफल का अनुभव करता है। उन्होंने चार प्रमुख वृत्तियों का वर्णन किया—
क्लिष्टवृत्ति — जिसका प्रारम्भ और परिणाम दोनों दुःखद होते हैं।
क्लिष्ट-अक्लिष्टवृत्ति — जिसमें प्रारम्भ में कष्ट होता है, किन्तु अंततः सुख और कल्याण प्राप्त होता है।
अक्लिष्ट-क्लिष्टवृत्ति — जो आरम्भ में सुखद प्रतीत होती है, परन्तु अंत में दुःख का कारण बनती है।
अक्लिष्टवृत्ति — जिसका प्रारम्भ और परिणाम दोनों ही शांति, सुख तथा कल्याणकारी होते हैं।
पुरोधा प्रमुख ने कहा कि प्रथम तीन वृत्तियाँ जीवों को प्रभावित करती हैं, जबकि अक्लिष्टवृत्ति ही ऐसी अवस्था है जो साधक को परमपुरुष के निकट ले जाती है।

आध्यात्मिक साधना का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को क्लेशों, कर्मबंधनों और संस्कारों की सीमाओं से ऊपर उठाकर उस दिव्य चेतना की ओर अग्रसर करना है जहाँ शांति, आनन्द और परम एकत्व का अनुभव होता है।
उन्होंने उपस्थित साधकों का आह्वान किया कि वे नियमित साधना, सदाचार, सेवा तथा ईश्वर-प्रणिधान के माध्यम से अपने जीवन को अक्लिष्टवृत्ति की दिशा में विकसित करें। ऐसा करने से वे कर्मबंधन से मुक्त होकर परमपुरुष की अनन्त करुणा, प्रेम और आनन्द का अनुभव कर सकेंगे।

अपने उद्बोधन के समापन में उन्होंने कहा:
“साधना का लक्ष्य केवल दुःखों से मुक्ति नहीं, बल्कि क्लेश, कर्म, विपाक और आशय की सीमाओं का अतिक्रमण कर परमपुरुष के साथ अखण्ड एकत्व की अनुभूति प्राप्त करना है।”

 

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