रायगढ़। इस्लामी वर्ष के सबसे गमगीन और अकीदतमंद दिन 10 मुहर्रम यौमे आशूरा पर रायगढ़ शहर में करबला के शहीदों की याद पूरे सम्मान, श्रद्धा और ग़म के साथ मनाई गई। शहर के विभिन्न क्षेत्रों से ताज़िए और मातमी जुलूस निकाले गए। जिनमें बड़ी संख्या में अकीदतमंद शामिल हुए। या हुसैन, या अली और या हसन की सदाओं के बीच पूरा शहर ग़म, अकीदत और इंसानियत के जज़्बे से सराबोर दिखाई दिया।

चांदनी चौक, इंदिरा नगर, मौदहापारा, तुर्कापारा सहित शहर के विभिन्न इलाकों मोहर्रम के मातमी जुलूस निकाले गए। जुलूसों के दौरान जगह-जगह शरबत, ठंडे पानी और लंगर का आयोजन किया गया, जहां मातमी जुलूस में शामिल लोगों के साथ-साथ आम राहगीरों की भी सेवा की गई। लोगों ने मिलकर सेवा कार्यों में भागीदारी निभाई और सामाजिक सौहार्द एवं गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल पेश की।

पिछले दस दिनों से शहर के विभिन्न इमामबाड़ों और मजलिसों में ज़िक्र-ए-शोहदाए करबला का सिलसिला जारी रहा। उलमाओं ने करबला की दर्दनाक दास्तान बयान करते हुए बताया कि किस प्रकार हज़रत इमाम हुसैन इब्न अली ने अपने परिवार और 72 वफ़ादार साथियों के साथ सत्य, न्याय, इंसाफ़ और इंसानियत की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी।
मजलिसों में विशेष रूप से हज़रत अब्बास अलमदार, हज़रत अली अकबर, मासूम हज़रत अली असगर, हज़रत क़ासिम इब्न हसन तथा अन्य शोहदाए करबला की महान कुर्बानियों को याद किया गया। उलमाओं ने कहा कि करबला केवल इतिहास की एक घटना नहीं, बल्कि अत्याचार के विरुद्ध डटकर खड़े रहने, सब्र, त्याग और ईमानदारी का अमर संदेश है।

रायगढ़ का ऐतिहासिक चांदनी चौक इमामबाड़ा अपनी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही ताज़ियादारी की परंपरा के लिए विशेष पहचान रखता है। वर्षों से यहां एक ही खानदान और समाज के लोग अपने पूर्वजों की परंपरा को निभाते हुए पूरे अनुशासन और अकीदत के साथ ताज़ियादारी करते आ रहे हैं। वहीं तुर्कापारा इमामबाड़ा भी अपनी भव्य और प्रसिद्ध ताज़ियादारी के लिए पूरे क्षेत्र में जाना जाता है, जहां हर वर्ष बड़ी संख्या में अकीदतमंद शामिल होकर करबला के शहीदों को ख़िराज-ए-अकीदत पेश करते हैं। इन दोनों इमामबाड़ों की ताज़ियादारी रायगढ़ की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

पूरे आयोजन के दौरान समाज के वरिष्ठजन, कमेटियों के पदाधिकारी और युवा स्वयंसेवक व्यवस्थाओं में पूरी मुस्तैदी से जुटे रहे। जुलूसों के संचालन, लंगर, शरबत वितरण, यातायात व्यवस्था तथा अकीदतमंदों की सुविधा का विशेष ध्यान रखा गया। देर रात तक परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ ताज़ियों का समापन हुआ और शहर में या हुसैन, या हसन और या अली की गमगीन सदाओं से गूंजता रहा।

प्रशासन द्वारा सुरक्षा के व्यापक इंतज़ाम किए गए, जिससे पूरे आयोजन के दौरान शांति, सौहार्द और भाईचारे का वातावरण बना रहा। यौमे आशूरा पर रायगढ़ ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि करबला की कुर्बानी किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए सत्य, न्याय, धैर्य, त्याग और मानवता का अमर संदेश है।

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