Monday, October 12, 2026
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Women’s and River विषय सोच शोध और परिचर्चा ….छत्तीसगढ़ से नेपाल तक … केलो के मुहाने से लेकर उसकी जीवनदायिनी कहलाने …. वीडियो प्रमोशनल बुक विमोचन

रायगढ़ । प्रदूषित होती नदियां और कहीं अस्तित्व खोती जीवन धारा को लेकर शहर के सामाजिक कार्यकर्ता सविता रथ और राजेश गुप्ता की परिकल्पना से लेकर शोध तक में महिलाएं और नदियां खासतौर पर आदिवासी जनजातियों वाले बाहुल्य क्षेत्र में खेती किसानी मत्स्य पालन तक ही सीमित नहीं, महिलाएं और नदियां विषय पर विषय पर पूरी एक किताब लिख दिया और एक शॉर्ट वीडियो जिसके माध्यम से बताने की कोशिश की गई कि नदियां जीवन के लिए क्या मायने रखती हैं।


बीते दिवस सामाजिक कार्यकर्ता सविता रथ और राजेश गुप्ता की परिकल्पना को जीवंत रूप में देखने मिला उनके द्वारा womens और river पर एक किताब और शॉर्ट वीडियो का विमोचन किया गया जिसके मुख्य अतिथि शहर के जाने माने चिकित्सक चिंतक विश्लेषक डॉक्टर राजू अग्रवाल और शहर के जाने माने रंगमंच कलाकार युवराज सिंह आजाद सहित सामाजिक कार्यकर्ता राजेश त्रिपाठी और अनेकों समाजिक कार्यकर्ता शहरवासियों पत्रकारों की मौजूदगी में बुक और वीडियो विमोचन पश्चात इस विषय पर परिचर्चा हुई। परिचर्चा से पूर्व किताब की लेखिका और शोधकर्ता सविता रथ ने विस्तार से इस पर अपनी बातें रखी उन्होंने बताया कि किताब में रायगढ़ की शहीद सत्यभामा जो नदियों को लेकर सत्याग्रह में अपने जान देने वाली एशिया की पहली आदिवासी महिला है जिन्होंने केलो नदी के पानी का औद्योगिक दोहन के खिलाफ आवाज उठाई। जिनका मत था कि प्राकृतिक जल संसाधनों पर पहला अधिकार आदिवासियों का है। केलो नदी के पानी का औद्योगिक दोहन को लेकर मुखर होने वाली देश पहली आदिवासी महिला शहीद सत्यभामा की मंशा का इस किताब में बखूबी तरीके से उल्लेख किया गया है। छत्तीसगढ़ से लेकर नेपाल तक में नदियों का महत्व को बताया गया है। जिसमे यह भी बताया गया है कि हमारे यहां नदियों को देवी स्वरूप मानते तो हैं लेकिन उसे प्रदूषित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते है वहीं नेपाल में नदी देवी के रूप में न सिर्फ मानते है और नदियों को प्रदूषित करने से भय खाते हैं वहां के निवासियों का मानना है कि नदी देवता अगर नाराज हो गए तो हमें अपने कहर से सबकुछ बर्बाद कर देंगे उनकी सफाई और देख रेख भी अत्यंत महत्वपूर्व है। वही हमारे यहां नदियों न सिर्फ तमाम शहर के गंदे पानी के साथ औद्योगिक जहरीले अपशिष्ट पदार्थों और कोयला खदानों की वजह से उसके अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

परिचर्चा के दौरान मशहूर चिकित्सक चिंतक विश्लेषक डॉक्टर राजू अग्रवाल ने केलो नदी को औद्योगिक अपशिष्ट से बचाने के लिए सामाजिक सहभागिता पर जोर दिया। जिसमे शहर गांव और प्रशासनिक अधिकारियो की टीम बने जो नदियों नालों में अपशिष्ट पदार्थों को रोकने समय समय पर उद्योगों का निरीक्षण करें और कागजी कार्रवाई के बजाय कठोर कार्रवाई हो। उन्होंने यह भी कहा कि उद्योगपति अपनी थोड़ी सी लागत को कम करने के लिए जल श्रोतों के नजदीक उद्योग लगाते हैं इस पर भी कठोरता से काम होना चाहिए।


वहीं रंगकर्मी युवराज सिंह आजाद ने अपनी बेबाक राय रखते हुए कहा कि वे इसके लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार चुने हुए जनप्रतिनिधियों को मानते हैं। उन्होंने कहा कि उद्योगों खदानों के लिए जमीन नहीं देने की बात हो हजारों लाखों पेड़ो की कटाई का मुद्दा हो, इन मुद्दों पर जो चुने हुए जनप्रतिनिधि होते हैं इन तमाम मुद्दों को लेकर कहीं भी प्रभावित जनता आदिवासियों और इसके खिलाफ खड़े नहीं होते हैं। जिले के तमनार और दूसरे स्थानों पर देखें तो और भयंकर ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तापमान लगातार तेजी से बढ़ रहा है और खदानों के लिए ग्रामीणों के विरोध के बावजूद लाखों पेड़ो की बलि चढ़ा दी जा रही हैं। एक पौधा लगाकर स्वस्थ्य स्वच्छ पर्यावरण का संदेश जनप्रतिनिधि देते है और वही उसी जगह दूसरे दिन हजारों पेड़ों को ग्रामीणों के विरोध के बावजूद औद्योगिक के लिए काट दिए जाते हैं।
इनके अलावा जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता राजेश त्रिपाठी ने भी लंबे अनुभवों को साझा करते हुए अपनी बात रखी और women and River किताब और विडियो की तारीफ करते हुए कहा किसी भी अभियान के सफल होने न होने स्थानीय जनभागीरथी पर निर्भर करती है। जिसके लिए व्यापक जनजागरुकता भी जरूरी है। केलो नदी के चर्चा में हर किसी ने शहीद सत्यभामा को याद किया और कहा जब जब केलो नदी के अस्तित्व की लड़ाई लड़ी जाएगी सत्यभामा याद की जाएगी।


सविता रथ ने नदी को वूमेंस एंड रिवर को लेकर  कहा कि छत्तीसगढ़ से लेकर नेपाल तक की यात्रा की वहां के समुदाय से नदी को लेकर उनके संस्कृति और रोजमर्रा को लेकर बातें हुई। व्यापक स्तर पर गहराई से नदी को लेकर बातें सामने आई। खासतौर पर नदी के तटीय क्षेत्र आबादी की महिलाओं का जिनका पूरा जीवन इसी गिर्द गिर्द घूमता है, जन्म से लेकर मृत्य तक का सफर एक अलग देश एक अलग कहानी कहती है।

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