रायगढ़। जिले में संचालित बिजली और स्पॉन्ज आयरन उद्योगों से निकलने वाली फ्लाई ऐश को लेकर सरकारी आंकड़े और ज़मीनी हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क सामने आया है। अप्रैल 2024 से मार्च 2025 तक की फ्लाई ऐश यूटिलाइजेशन रिपोर्ट के मुताबिक जिले के 30 थर्मल पावर व स्पॉन्ज आयरन प्लांटों से कुल 1,92,47,423.52 मीट्रिक टन फ्लाई ऐश का उत्पादन हुआ, जबकि दस्तावेजों में इसके उपयोग का आंकड़ा 1,97,18,330.69 मीट्रिक टन यानी उत्पादन से भी ज्यादा दिखाया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा फ्लाई ऐश तमनार स्थित ओ.पी. जिंदल थर्मल पावर प्लांट से निकली — करीब 90 लाख टन, जिसका उपयोग महज 92.63% ही दर्शाया गया है। इसके अलावा अडाणी पावर (छोटे भंडार) से 13 लाख टन, एनटीपीसी की लारा सुपर थर्मल पावर परियोजना से 31 लाख टन और जिंदल स्टील एंड पावर (डोंगामहुआ) से करीब 15.7 लाख टन फ्लाई ऐश निकलने का उल्लेख है।
आंकड़ों में गड़बड़ी की झलक
चौंकाने वाली बात यह है कि कई कंपनियों का उपयोग 100% से भी ज्यादा दिखाया गया है। जैसे TRN एनर्जी (करीब 151%), सारडा एनर्जी एंड मिनरल्स (करीब 123%) और लारा सुपर थर्मल (करीब 110%)। यानी इन कंपनियों ने अपने सालाना उत्पादन से ज्यादा ऐश उपयोग कर ली। रिपोर्ट में ऐश डाइक निर्माण और कृषि उपयोग के कॉलम में एक भी उद्योग का आंकड़ा दर्ज नहीं है, जबकि माइन फिलिंग (करीब 99.8 लाख टन) और रोड मेकिंग (करीब 47 लाख टन) में सबसे ज्यादा ऐश खपाई गई बताई जा रही है। दोनों ऐसी श्रेणियां हैं जिनकी वास्तविक निगरानी सबसे मुश्किल मानी जाती है।
कागज पर शत-प्रतिशत, सड़क और नदी पर काली धूल
दूसरी ओर, जिले के लोगों का कहना है कि यह जो आंकड़े दिखाए जा रहे हैं, ज़मीनी हालात उससे मेल नहीं खाते। रायगढ़ शहर और आसपास के गांवों में सड़कों किनारे उड़ती काली राख, प्लांटों के आसपास जमा ऐश के ढेर और बारिश में बहकर केलो नदी के जरिए महानदी तक पहुंचता प्रदूषित पानी लंबे समय से चिंता का विषय बना हुआ है। स्थानीय निवासियों और पर्यावरण से जुड़े लोगों का आरोप है कि माइन फिलिंग व रोड मेकिंग जैसी श्रेणियों की आड़ में बड़ी मात्रा में ऐश को खुले में डंप कर दिया जाता है, जो मानसून में बहकर जलस्रोतों में मिल जाती है। और ये लगातार मीडिया में सुर्खियां बनी रहती है।
यदि रिपोर्ट के दावे सही मान लिए जाएं तो जिले में फ्लाई ऐश का शत-प्रतिशत सुरक्षित निपटान हो रहा होना चाहिए, लेकिन हवा में घुलती काली धूल, बढ़ता प्रदूषण स्तर और नदियों में दिखने वाली राख की परत इस दावे पर सवाल खड़े करती है। पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे न सिर्फ जल-स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं, बल्कि क्षेत्र में सांस, कैंसर, त्वचा रोग संबंधी बीमारियां और तापमान वृद्धि का खतरा भी बढ़ रहा है।
प्रशासनिक निगरानी पर सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक स्वतंत्र थर्ड-पार्टी ऑडिट और फील्ड-लेवल फिजिकल वेरिफिकेशन नहीं होगा, तब तक सिर्फ कागजी आंकड़ों के आधार पर 100% उपयोग के दावे होते रहेंगे और कागजी खेल चलता रहेगा, इस पर भरोसा करना मुश्किल है। जिलेवासियों की मांग है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और खनिज विभाग संयुक्त रूप से हर प्लांट का मौके पर जाकर सत्यापन करें, ताकि रिपोर्ट के आंकड़े और ज़मीनी हकीकत के बीच का यह फासला उजागर हो सके और केलो-महानदी के साथ साथ आबोहवा को और अधिक प्रदूषित होने से बचाया जा सके।

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