Saturday, August 29, 2026
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तकनीक की दौड़ में रिश्तों की दूरी — बदलते समाज का संवेदनशील आईना ….मोबाइल और डिजिटल दुनिया के बीच सिमटती संवाद की परंपरा… पारिवारिक रिश्तों पर पड़ रहा असर ..तेजी से बदलते समाज का व्यवहार — एक संवेदनशील चित्रण

 

 

तेजी से बदलते डिजिटल युग में जहां तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, वहीं मानवीय रिश्तों में बढ़ती दूरी एक गंभीर चिंता बनकर उभर रही है। एक मार्मिक प्रसंग के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि कैसे मोबाइल और आभासी दुनिया में डूबती नई पीढ़ी पारिवारिक संवाद और आत्मीय संबंधों से दूर होती जा रही है, जिससे समाज के पारंपरिक मूल्यों पर भी प्रभाव पड़ रहा है।

एक छोटे से गाँव में, जहाँ जीवन सादगी और सुकून से भरा हुआ था, वहीं रामू काका अपनी सहज और संतुलित दिनचर्या के लिए जाने जाते थे। शहरों की भागदौड़ से दूर, वे अक्सर पुराने पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर लोगों से हँसी-खुशी बातें करते थे। उनके लिए यही पल जीवन का असली आनंद थे।
एक दिन उनका पोता राहुल, जो अब प्रयागराज में पढ़ाई कर रहा था, छुट्टियों में घर आया। रामू काका की खुशी का ठिकाना नहीं था—उन्हें लगा जैसे घर में फिर से पुरानी रौनक लौट आई हो। लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने महसूस किया कि राहुल का अधिकांश समय मोबाइल फोन में ही बीतने लगा है। बातचीत की जगह अब स्क्रीन ने ले ली थी।


एक शाम रामू काका ने उसे प्यार से पास बुलाकर कहा, “बेटा, थोड़ी देर बैठकर बातें करें।” राहुल, जो अपने मोबाइल की आभासी दुनिया में पूरी तरह डूबा हुआ था, बिना नज़र उठाए बोला,
“दादाजी, अभी थोड़ा व्यस्त हूँ… बाद में।” राहुल के इस बदलते व्यवहार को देखकर रामू काका भीतर ही भीतर उदास हो गए। फिर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा। चुपचाप बैठकर वे उन दिनों को याद करने लगे, जब बच्चे अपने दादा-दादी के साथ घंटों बैठते, कहानियाँ सुनते और गाँव-घर, खेत-खलिहान की बातें बड़े मन से साझा करते थे।
अगले दिन गाँव में एक शादी का कार्यक्रम था। रामू काका राहुल को अपने साथ ले गए। वहाँ का जीवंत माहौल—बच्चों की खिलखिलाहट, बुजुर्गों के अनुभवों से भरे किस्से और लोगों का आत्मीय अपनापन—धीरे-धीरे राहुल को अपनी ओर आकर्षित करने लगा। उसने अपना मोबाइल जेब में रख दिया और लोगों के साथ घुलने-मिलने लगा।
वापसी के समय राहुल ने भावुक होकर कहा, “दादाजी, हम तकनीक में इतने उलझ गए हैं कि अपने ही रिश्तों से दूर होते जा रहे हैं।”
रामू काका ने हल्की मुस्कान के साथ शांत स्वर में उत्तर दिया, “बेटा, बदलाव जरूरी है, लेकिन इतना भी नहीं कि अपने ही हमसे पराए हो जाएँ।”

 

लेखक /- डॉ. संजय कुमार यादव, सहायक प्रोफेसर ( डिजिटल मार्केटिंग एवं उपभोक्ता मनोविज्ञान )

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