माँ,
हर पल, हर क्षण,
हर साँस में
तुम बसी हो।
तुम्हारे बिना
न कोई पहचान है मेरी,
न कोई अस्तित्व।
मेरे होने का
हर अर्थ
तुमसे ही प्रकाशित है।
फिर
तुम्हारे नाम पर
एक दिन किसने बाँट दिया?
माँ,
तुमने ही
प्राण दिए,
जीवन दिया,
चलना, गिरना, सँभलना
और जीना सिखाया।
संस्कार,
आदर्श,
आचरण,
स्नेह और संवेदनाएँ—
सब कुछ
तुम्हारी ही देन है।
मैं
प्राण देकर भी
तुम्हारे ऋण से
मुक्त नहीं हो सकता,
क्योंकि
मेरे प्राण भी
तुम्हीं ने दिए हैं।
फिर
तुम्हारे नाम पर
एक दिन तय कर,
पार्टी, उपहार, कार्ड
और संदेशों की
यह परंपरा
कहाँ से आई?
कैसे
ममता जैसी पवित्र अनुभूति भी
बाज़ार की वस्तु बन गई?
क्या अब
रिश्ते-नाते,
भावनाएँ,
संवेदनाएँ,
आदर्श, नैतिक मूल्य
और प्रेम भी
बाज़ारवाद की संस्कृति का
हिस्सा बन जाएँगे?
जहाँ
हर एहसास
कीमत में तौला जाएगा,
हर संबंध
विज्ञापन बन जाएगा,
और
हर उत्सव
खरीद-फरोख्त का अवसर।
माँ,
तुम तो
त्याग की वह शाश्वत प्रतिमा हो
जो बिना किसी अपेक्षा के
पूरा जीवन
अपनों के लिए जलती रहती है।
तुम्हें
एक दिन में बाँध देना
वैसा ही है
जैसे
सूरज को
एक दीपक में कैद करना।
माँ,
तुम उत्सव नहीं,
अस्तित्व हो।
तुम दिवस नहीं,
जीवन हो।
तुम्हें
किसी एक दिन में नहीं,
हर दिन
हर धड़कन में
जीया जाना चाहिए।
—–
*गणेश कछवाहा*
चिंतक, लेखक एवं समीक्षक
रायगढ़, छत्तीसगढ़।
gp.kachhwaha@gmail.com

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