Tuesday, July 14, 2026
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रायगढ़ : जहां इतिहास बोलता है, आस्था सांस लेती है और संस्कृति गूंजती है …धार्मिक, सांस्कृतिक, पुरातात्विक एवं प्राकृतिक विरासत का अद्भुत संगम थोड़ी सी पहल और मिल सकती है ..अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर पहचान …है अपार संभावनाएं

 

 

— गणेश कछवाहा

छत्तीसगढ़ का नाम आते ही यदि किसी जिले की पहचान संस्कृति, संगीत, इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य के अद्भुत संगम के रूप में सामने आती है तो वह है रायगढ़। सामान्यतः लोग इसे औद्योगिक नगर, संगीत नगरी अथवा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में जानते हैं, किंतु रायगढ़ की वास्तविक पहचान इससे कहीं अधिक व्यापक और गौरवशाली है। यह वह भूमि है जहां हजारों वर्ष पुरानी मानव सभ्यता के प्रमाण सुरक्षित हैं, जहां धार्मिक आस्था की अविरल धारा बहती है, जहां प्राकृतिक पर्यटन अपने मोहक रूप में पर्यटकों का स्वागत करता है और जहां भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं कथक की विशिष्ट परंपरा आज भी जीवंत है।

रायगढ़ वास्तव में इतिहास, संस्कृति, अध्यात्म, लोकजीवन और प्रकृति का ऐसा जीवंत संग्रहालय है, जिसकी हर धरोहर अपने भीतर एक गौरवशाली कहानी समेटे हुए है।

प्रागैतिहासिक सभ्यता का जीवंत साक्ष्य/-
रायगढ़ की धरती हजारों वर्ष पुरानी मानव सभ्यता की गवाह रही है। जिले के सिंघनपुर, कबरा पहाड़, करमागढ़ सहित अनेक शैलाश्रयों में प्राप्त शैलचित्र यह प्रमाणित करते हैं कि इस क्षेत्र में आदिमानव निवास करते थे। इन शैलचित्रों में शिकार, नृत्य, पशु-पक्षियों, सामाजिक जीवन और तत्कालीन मानव गतिविधियों का अत्यंत सजीव चित्रण मिलता है।

पुरातत्वविदों के अनुसार ये शैलचित्र भारतीय/-

प्रागैतिहासिक कला की अमूल्य धरोहर हैं। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में सिंघनपुर शैलचित्रों की खोज के बाद रायगढ़ विश्व के पुरातात्विक मानचित्र पर स्थापित हुआ और इन्हीं धरोहरों के कारण इसे “छत्तीसगढ़ का भीमबेटका” भी कहा जाने लगा। यदि इन स्थलों का वैज्ञानिक संरक्षण और व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए तो यह क्षेत्र विश्वस्तरीय पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है।

राम झरना : जहां प्रकृति और आस्था का मिलन होता है
प्राकृतिक पर्यटन की दृष्टि से राम झरना रायगढ़ की सबसे सुंदर और लोकप्रिय धरोहरों में शामिल है। घने जंगलों और मनोहारी प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित इस स्थल के बारे में मान्यता है कि वनवास काल में भगवान श्रीराम यहां आए थे और इसी झरने का जल ग्रहण किया था। इसी कारण इसका नाम राम झरना पड़ा।
आज यह स्थल धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति प्रेमियों, पर्यटकों और फोटोग्राफी के शौकीनों का भी प्रमुख आकर्षण बन चुका है।

इंदिरा विहार : परिवारों और प्रकृति प्रेमियों की पसंद
रायगढ़ शहर के कोटरा और गोवर्धनपुर क्षेत्र में स्थित इंदिरा विहार एक सुंदर पिकनिक स्पॉट तथा छोटा चिड़ियाघर है। यहां जंगली सूअर, बंदर, खरगोश, साही सहित अनेक छोटे वन्यजीव, पक्षियों और सरीसृपों की विभिन्न प्रजातियां देखी जा सकती हैं।

इंदिरा विहार के अंतिम छोर पर बना स्टॉप डैम इसकी सुंदरता को और बढ़ा देता है। यहां स्थानीय वन्यजीव पानी पीने आते हैं तथा यह स्थान ड्रोन फोटोग्राफी के लिए भी अत्यंत प्रसिद्ध है। विशेष बात यह है कि यहां तितलियों की अनेक दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं, जिन पर वैज्ञानिक सर्वेक्षण भी किए जा चुके हैं।

गोमर्डा अभयारण्य :
जैव विविधता की अमूल्य धरोहर वन्यजीव प्रेमियों के लिए गोमर्डा अभयारण्य किसी स्वर्ग से कम नहीं है। जैव विविधता से समृद्ध यह अभयारण्य अनेक प्रकार के वन्यजीवों, पक्षियों तथा दुर्लभ वनस्पतियों का सुरक्षित आवास है। पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव अध्ययन और प्राकृतिक पर्यटन की दृष्टि से इसका विशेष महत्व है।

धार्मिक आस्था के केंद्रों से आलोकित रायगढ़/-
रायगढ़ केवल प्राकृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों का जिला नहीं, बल्कि धार्मिक चेतना का भी प्रमुख केंद्र है। नगर देवी बूढ़ी माई मंदिर, श्री गौरीशंकर मंदिर, चंद्रपुर की मां चंद्रहासिनी, बनोरा का अघोर शक्तिपीठ ब्रह्मनिष्ठालय, कोसमनारा का श्री सत्यनारायण बाबा धाम, बंजारी मंदिर, सारंगढ़ काली माता मंदिर, नाथलदाई मंदिर और पहाड़ मंदिर जैसे अनेक धार्मिक स्थल यहां की आध्यात्मिक विरासत को समृद्ध बनाते हैं।

नगर देवी बूढ़ी माई : रायगढ़ की अधिष्ठात्री देवी
दरोगापारा स्थित करबला तालाब के समीप स्थित मां बूढ़ी माई मंदिर रायगढ़ के सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित मंदिरों में गिना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मां बूढ़ी माई रायगढ़ नगर की कुलदेवी एवं अधिष्ठात्री देवी हैं। नगर की सुख-समृद्धि और रक्षा के लिए आज भी किसी भी शुभ कार्य से पहले लोग माता का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते।

चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। कलश यात्रा, दुर्गा सप्तशती पाठ, ज्योति प्रज्ज्वलन, भजन-कीर्तन और विशाल भंडारे यहां की विशेष पहचान हैं। यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है।

श्री गौरीशंकर मंदिर : श्रद्धा, स्थापत्य और सेवा का प्रतीक/-
रायगढ़ के प्रसिद्ध उद्योगपति एवं समाजसेवी सेठ किरोड़ीमल ने वर्ष 1946 में श्री गौरीशंकर मंदिर का निर्माण प्रारंभ कराया, जिसकी प्राण प्रतिष्ठा 1948 में हुई। उत्कृष्ट स्थापत्य, भव्य शिल्पकला और आध्यात्मिक वातावरण के कारण यह मंदिर शीघ्र ही शहर की पहचान बन गया।
सेठ किरोड़ीमल ने मथुरा की झूलोत्सव परंपरा से प्रेरित होकर यहां जन्माष्टमी मेले की शुरुआत भी की, जो आज छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल है।

मां चंद्रहासिनी : करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था
रायगढ़ के समीप चंद्रपुर स्थित मां चंद्रहासिनी मंदिर प्रदेश के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। महानदी के रमणीय तट पर स्थित यह मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। नवरात्र के अवसर पर यहां विशाल मेले का आयोजन होता है जिसमें प्रदेश सहित देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

बनोरा का अघोर शक्तिपीठ : सेवा और साधना की भूमि
औघड़ संत शिरोमणि बाबा प्रियदर्शी राम जी की तपोभूमि के रूप में प्रसिद्ध अघोर शक्तिपीठ ब्रह्मनिष्ठालय, बनोरा आज मानव सेवा, करुणा, समरसता और आध्यात्मिक साधना का राष्ट्रीय केंद्र बन चुका है। गुरु पूर्णिमा पर यहां देशभर से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं और पूरा परिसर सेवा, अनुशासन तथा गुरु भक्ति का अनुपम उदाहरण बन जाता है।

श्री सत्यनारायण बाबा धाम : तपस्या की अनूठी मिसाल कोसमनारा स्थित श्री सत्यनारायण बाबा धाम रायगढ़ अंचल की धार्मिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र है। बाबा सत्यनारायण वर्षों से खुले आकाश के नीचे बिना अन्न ग्रहण किए कठोर तपस्या में लीन हैं। श्रद्धालु उन्हें भगवान शिव का स्वरूप मानते हैं। वर्षभर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है और विभिन्न धार्मिक आयोजनों में हजारों लोग शामिल होकर आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करते हैं।

सारंगढ़ की काली माता और अन्य धार्मिक धरोहरें
सारंगढ़ का काली माता मंदिर, नाथलदाई मंदिर तथा पहाड़ मंदिर भी स्थानीय जनजीवन की गहरी आस्था के केंद्र हैं। ये मंदिर धार्मिक महत्व के साथ-साथ क्षेत्र की लोकसंस्कृति और परंपराओं के जीवंत प्रतीक हैं।
रायगढ़ : कथक और संगीत की सांस्कृतिक राजधानी
रायगढ़ की पहचान केवल धार्मिक या प्राकृतिक पर्यटन तक सीमित नहीं है। यह भारतीय शास्त्रीय संगीत और कथक नृत्य की विशिष्ट परंपरा का भी प्रमुख केंद्र रहा है।
पूर्व रायगढ़ रियासत के महाराजा चक्रधर सिंह कला, साहित्य और संगीत के महान संरक्षक थे। उनके संरक्षण में विकसित “रायगढ़ घराना” आज भारतीय कथक की प्रतिष्ठित परंपराओं में शामिल है। इसकी विशेषता लयकारी, परन, तोड़े और प्रकृति चित्रण में दिखाई देती है।

पंडित कार्तिक राम, पंडित फिरतू महाराज, पंडित बर्मन लाल तथा पंडित कल्याण दास महंत जैसे महान नृत्याचार्यों ने इस घराने को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
महाराजा चक्रधर सिंह की स्मृति में आयोजित होने वाला चक्रधर समारोह आज देश के प्रतिष्ठित संगीत एवं नृत्य आयोजनों में गिना जाता है, जिसमें देश-विदेश के ख्यातिप्राप्त कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देते हैं।
राजमहल और प्राचीन स्थापत्य की गौरवगाथा
रायगढ़ का ऐतिहासिक राजमहल (मोतीमहल) पूर्व रियासतकालीन वैभव, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक इतिहास का जीवंत साक्षी है। इसके अतिरिक्त पुजारीपाली का प्राचीन विष्णु मंदिर क्षेत्र की धार्मिक एवं स्थापत्य परंपरा का महत्वपूर्ण उदाहरण है।


पर्यटन विकास की अपार संभावनाएं

आज आवश्यकता इस बात की है कि रायगढ़ की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों का समुचित संरक्षण एवं वैज्ञानिक विकास किया जाए। यदि इन स्थलों को बेहतर आधारभूत सुविधाओं, शोध, संरक्षण और प्रभावी पर्यटन योजनाओं से जोड़ा जाए तो रायगढ़ राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर भी अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर सकता है।

रायगढ़ वास्तव में केवल एक जिला नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, आस्था, कला और प्रकृति का ऐसा अनमोल खजाना है, जिसकी प्रत्येक धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। इस विरासत का संरक्षण केवल शासन की नहीं बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। जब तक हम अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को पहचानकर उन्हें सहेजेंगे नहीं, तब तक विकास की हमारी यात्रा भी अधूरी रहेगी।

— गणेश कछवाहा

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