Friday, August 28, 2026
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RTI का खुलासा: एक साल में Event Craft Entertainment को 12.61 करोड़, बाकी मीडिया हाशिए पर ….जनहित या अफसरों की महफ़िल….? किसका संरक्षण, सरकार की जनकल्याणकारी योजना सोशल मीडिया से प्रचारित …प्रक्रिया पर बड़ा सवाल..सत्ता के गलियारों में होने वाली चकाचौंध भरी…

रायगढ़।
छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सूचना का अधिकार (RTI) के तहत सामने आए दस्तावेज़ों ने सरकारी पैसे के इस्तेमाल की ऐसी तस्वीर पेश की है, जो चौंकाने वाली ही नहीं बल्कि शर्मनाक भी है। सोशल मीडिया के माध्यम से आम जनता तक सरकार द्वारा संचालित जन कल्याणकारी योजनाएं आसानी से पहुंच जाती है उन परिस्थितियों में छत्तीसगढ़ ने जनता के पैसों को इस माध्यम से कहां खर्च किया यह एक बड़ा सवाल है।

01 अप्रैल 2023 से 31 मार्च 2024 के बीच जनसंपर्क विभाग ने Event Craft Entertainment नामक एक निजी कंपनी को 12 करोड़ 61 लाख रुपये से अधिक का भुगतान कर दिया। मतलब साफ है—हर महीने औसतन एक करोड़ रुपये से ज्यादा का “इंटरटेनमेंट”।
सवाल यह नहीं है कि पैसा खर्च हुआ, सवाल यह है कि यह पैसा आखिर किसके मनोरंजन के लिए खर्च हुआ?
जनता के लिए? या फिर अफसरों और सत्ता के गलियारों में होने वाली चकाचौंध भरी महफिलों के लिए?

जनसंपर्क विभाग का मूल दायित्व है—सरकारी योजनाओं और नीतियों की जानकारी आम जनता तक पहुँचाना। लेकिन आज के डिजिटल युग में, जब सूचना मोबाइल फोन के एक क्लिक में उपलब्ध है, तब साढ़े बारह करोड़ रुपये के इवेंट और प्रचार आखिर क्यों?
क्या ऐसा कोई असाधारण जनहित कार्य हुआ, जिसकी कीमत करोड़ों में आंकी जाए?

सूत्रों की मानें तो इस तथाकथित प्रचार के नाम पर भव्य आयोजन, आलीशान होटल, महंगे मंच, लाइट-साउंड और VIP ट्रीटमेंट पर खुलकर सरकारी खजाना लुटाया गया। लेकिन इन आयोजनों से आम जनता को क्या मिला—इसका कोई ठोस जवाब विभाग के पास नहीं है।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि यह पूरा खेल कुछ चुनिंदा अफसरों की पसंदीदा कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए रचा गया। चर्चाओं में यह बात जोर पकड़ रही है कि Event Craft Entertainment को एक प्रभावशाली IAS अधिकारी का संरक्षण प्राप्त है। अगर यह सच है, तो मामला सिर्फ वित्तीय अनियमितता का नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर गहरी सांठगांठ का बन जाता है।

अब सवालों की फेहरिस्त लंबी है—

क्या इस कंपनी को काम देने में निष्पक्ष टेंडर प्रक्रिया अपनाई गई?
क्या अन्य एजेंसियों को बराबरी का मौका मिला?
क्या करोड़ों के भुगतान के बदले किए गए काम का कोई स्वतंत्र मूल्यांकन हुआ?
और सबसे अहम, क्या यह खर्च वास्तव में जनहित में था?

राज्य में जहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के लिए बजट की कमी का रोना रोया जाता है, वहीं जनसंपर्क के नाम पर करोड़ों रुपये यूं ही बहा दिए जाते हैं। यह विरोधाभास साफ बताता है कि प्राथमिकता जनता नहीं, बल्कि सत्ता और अफसरशाही की सुविधाएँ बन चुकी हैं।

अगर सब कुछ नियम-कायदों के तहत हुआ है, तो सरकार और जनसंपर्क विभाग को इस मामले की स्वतंत्र जांच से डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। भुगतान का पूरा ब्योरा सार्वजनिक किया जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि आखिर जनता को इस 12.61 करोड़ के बदले मिला क्या? क्योंकि अगर इस खुलासे पर भी चुप्पी साध ली गई, तो यह मान लिया जाएगा कि छत्तीसगढ़ में सरकारी खजाना अब जनकल्याण का नहीं, बल्कि कुछ खास लोगों के “इंटरटेनमेंट” का साधन बन चुका है।

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