अगस्त 2019 के सात साल बाद, जम्मू और कश्मीर में एक निर्वाचित सरकार है, एक सक्रिय विधान सभा है और नियमित रूप से यह आधिकारिक भरोसा मिलता रहता है कि हालात सामान्य हैं। 28 सितंबर को, इस विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें भारत सरकार से वह करने को कहा गया है, जिसका वादा उसने बहुत पहले किया था, यानी राज्य का दर्जा वापस करना। यह तथ्य कि मतदान के दो साल बाद सदन को फिर से राज्य के दर्जे के बारे में पूछना पड़ा है, यह बहुत कुछ बताता है कि हालात क्या हैं।
यह मुद्दा किसी एक पार्टी या एक इलाके का नहीं है। यह उन सभी लोगों से जुड़ा है, जो मानते हैं कि लोकतंत्र का आकलन सिर्फ़ इस बात से नहीं होता कि चुनाव होते हैं या नहीं, बल्कि इस बात से होता है कि जीतने वालों को राज करने दिया जाता है या नहीं।
*सदन ने अब क्या पूछा?*
यह प्रस्ताव छोटा है। इसमें कहा गया है, “इस सदन द्वारा 26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 को पारित किए गए प्रस्तावों के अलावा, यह सदन भारत सरकार से जम्मू और कश्मीर को तत्काल और अनिवार्य रूप से पूर्ण राज्य का दर्जा वापस दिलाने की मांग करता है और यह तय करता है कि यह प्रस्ताव भारत सरकार को भेजा जाए।” मुख्यमंत्री ने इसे 25 सितंबर को पेश किया। इसे 28 सितंबर को लगभग चार घंटे की बहस के बाद ध्वनि मत से पारित कर दिया गया, जिसमें भाजपा सदस्यों ने सदन का बहिर्गमन किया।
कोई प्रस्ताव अपने आप राज्य का दर्जा बहाल नहीं कर सकता, और इसका कभी ऐसा मतलब भी नहीं था। यह आम जनता द्वारा निर्वाचित सदन की ओर से केंद्र को किया गया एक अनुरोध है। लेकिन इसके लिए दो सालों तक इंतज़ार करना पड़ा।
इस प्रस्ताव में पहले के जिन दो प्रस्तावों का ज़िक्र है, उनसे भाजपा नाराज़ थी, इसलिए यह याद रखना ज़रूरी है कि इन प्रस्तावों में क्या कहा गया था।
वर्ष 2000 में, नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार ने राज्य स्वायत्तता कमेटी की रिपोर्ट सदन के सामने पेश की, जो अप्रैल 1999 से टेबल पर धूल खाती पड़ी थी। एक विशेष सत्र में पांच दिन की बहस के बाद, सदन ने 26 जून को “इसे मंज़ूरी दी और इसमें की गई सिफारिशों को माना” और केंद्र और राज्य सरकारों से उन्हें लागू करने को कहा। रिपोर्ट में 1953 से पहले की संवैधानिक स्थिति पर लौटने की मांग की गई थी। उस दिन भाजपा, कांग्रेस और जेडी (यू) के सदस्य बहिर्गमन कर गए थे। 4 जुलाई को, केंद्रीय कैबिनेट ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इसे मानने से समय पीछे चला जाएगा।
नवंबर 2024 में, मौजूदा सरकार के सत्ता में आने के कुछ हफ़्ते बाद, सदन ने दूसरा प्रस्ताव पारित किया। यह प्रस्ताव “विशेष दर्जे और संवैधानिक गारंटियों की अहमियत को फिर से सुनिश्चित करता है” और “उन्हें एकतरफ़ा हटाने पर चिंता ज़ाहिर करता है”। इसने केन्द्र से “जम्मू-कश्मीर के चुने हुए लोगों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत शुरू करने” के लिए भी कहा। इसने कोई संवैधानिक फ़ॉर्मूला नहीं बताया था, केवल बातचीत करने के लिए कहा था। भाजपा सदस्यों ने इसकी प्रतियां फाड़ दी थीं, और शोर-शराबे के बीच यह ध्वनि मत से पारित हो गया था।
इस बार मुख्यमंत्री ने अनुच्छेद-370 और 35-A को पाठ से बाहर रखा, ताकि भाजपा के पास सदन में रुकावट डालने का कोई बहाना न रहे। सत्ता पक्ष के कुछ सदस्य, निर्दलीय और पीडीपी सदस्यों ने, इसे प्रस्ताव में रखने के लिए, संशोधन पेश किए। मुख्यमंत्री ने उनसे यह कहते हुए इन संशोधनों को वापस लेने को कहा कि सदन पहले ही विशेष दर्जे पर दो प्रस्ताव पारित कर चुका है, और वे मान गए। कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस, मेरी अपनी पार्टी, पीडीपी और पीपुल्स कॉन्फ्रेंस सभी ने प्रस्ताव का समर्थन किया।
*एक जुड़ाव, कोई एहसान नहीं*
इस सब के पीछे यह सवाल है कि अनुच्छेद-370 क्या था। इसे अक्सर एक ऐसा खास अधिकार बताया जाता है, जिसे सुविधा के लिए दिया गया था और उतनी ही आसानी से वापस भी लिया जा सकता था। वास्तव में यह जम्मू-कश्मीर के लोगों और केंद्र सरकार के बीच एक संवैधानिक जुड़ाव था, जिसे भारत की संविधान सभा ने उस समय बनाया था, जब महाराजा हिचकिचा रहे थे और लोगों ने, जिनकी अपनी कोई सेना नहीं थी, कई अनुच्छेदों के साथ विलय के दस्तावेज़ के ज़रिए भारत के राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ अपना भविष्य जोड़ने का फैसला किया था। उस जुड़ाव को 1952 के दिल्ली समझौते के ज़रिए आगे बढ़ाया गया। फिर राज्य की अपनी संविधान सभा ने इसकी जांच की और उसने अनुच्छेद में किसी बदलाव की सिफ़ारिश नहीं की और राज्य की संविधान सभा भंग हो गई।
सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2023 में इस अनुच्छेद-370 और 35-ए पर रोक को सही ठहराया था, और मैं कोर्ट की अथॉरिटी पर सवाल नहीं उठाता। लेकिन किसी कदम को कानूनी मान लेने से ही यह उन लोगों के मन में नहीं बैठ जाता, जिनसे सलाह नहीं ली गई थी। अगस्त 2019 में जो किया गया, वह दिल्ली में संसद द्वारा बातचीत से तय रिश्ते में बदलाव था, न कि उन लोगों या संस्थाओं द्वारा, जिन्होंने इसे बनाया था। इसीलिए नीचे दी गई हर शिकायत घूम-फिरकर उसी सवाल पर वापस आती है।
*मुख्यमंत्री ने सदन को क्या बताया?*
प्रस्ताव पर अपने भाषण में, मुख्यमंत्री ने सदन को एक सूची दी कि एक केंद्र शासित प्रदेश में एक चुनी हुई सरकार क्या नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि सरकार को सत्ता में आए दो साल हो गए हैं और वादा अभी भी पूरा नहीं हुआ है। उन्होंने पूछा कि सुप्रीम कोर्ट का राज्य का दर्जा “जल्द से जल्द” बहाल करने का निर्देश दो साल तक कैसे खिंच सकता है। उन्होंने पूछा कि केंद्र का “सही समय” से क्या मतलब है, और क्या यह बहाली उग्रवाद खत्म होने पर निर्भर करती है। अगर ऐसा होता है, तो उन्होंने कहा, यह फैसला असल में इस्लामाबाद में है, नई दिल्ली में नहीं। उन्होंने कहा कि राज्य का दर्जा लोगों का अधिकार है, किसी पार्टी या परिवार का नहीं।
फिर उन्होंने अपनी सरकार के रोज़ाना के काम के उदाहरण दिए। ऑफिस संभालने के लगभग दो साल बाद भी, जम्मू और कश्मीर में अभी भी कोई एडवोकेट जनरल नहीं है, भले ही सरकार ने औपचारिक रूप से इस मामले को उठाया है। व्यापारिक नियम-कायदे लगभग दो साल पहले केंद्र को भेजे गए थे और उन्हें अभी तक मंज़ूरी नहीं मिली है, इसलिए अभी भी इस बात को लेकर भ्रम है कि कौन, किस शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है। दिहाड़ी मज़दूरों को नियमित करने की जांच के लिए बनी कमिटी ने अपनी रिपोर्ट नहीं दी है, और मुख्यमंत्री ने कहा कि इसका कारण यह है कि यह एक केंद्र शासित प्रदेश है।
आरक्षण पर फ़ैसला भी यही पैटर्न दिखाता है। मंत्रिमंडल ने यह फ़ैसला एक उप-समिति द्वारा इस मुद्दे पर अध्ययन करने के बाद लिया था, और यह उप राज्यपाल के पास भेजा गया था। केंद्र ने सवाल उठाए, सरकार ने उनके जवाब दिए और फ़ैसला फिर से आगे भेज दिया, और यह अभी भी लंबित है। उन्होंने कहा कि सरकार को बताया गया है कि सुरक्षा और कानून व्यवस्था का मामला उप राज्यपाल के पास है और बाकी चुनी हुई सरकार के पास, और उन्होंने पूछा कि फिर राजस्व विभाग और उसके अधिकारियों को इसके दायरे से बाहर क्यों रखा गया है?
उन्होंने उन संस्थानों के बारे में भी बात की, जिनकी कभी चुनी हुई सरकार के अधिकार क्षेत्र में जगह थी। एकेडमी ऑफ़ आर्ट, कल्चर एंड लैंग्वेजेज़ अब उप राज्यपाल के अधीन है। अवंतीपोरा और राजौरी की यूनिवर्सिटी में उप राज्यपाल चांसलर होते हैं, और मुख्यमंत्री, जिनकी पहले की व्यवस्था में पदेन भूमिका थी, अब कुछ नहीं है। उन्होंने पूछा कि यह भूमिका उन्हें वापस देने में क्या समस्या है?
यह सब सिर्फ़ सिद्धांत की बात नहीं है। ये फ़ाइलें डेस्क पर इंतज़ार कर रही हैं, और लोग इन फ़ाइलों का इंतज़ार कर रहे हैं।
*अध्यक्ष को चिट्ठियां*
भाषण का सबसे खास हिस्सा दो चिट्ठियों के बारे में था। मुख्यमंत्री ने सदन को बताया कि मुख्य सचिव और विधि सचिव ने विधानसभा सचिवालय को चिट्ठी लिखकर कहा था कि प्रस्ताव पर विचार न किया जाए। खबर है कि चिट्ठियां उनके प्रस्ताव पेश करने के तीन दिन बाद आईं, जबकि सदन ने इसे पहले ही स्वीकार कर लिया था।
वह मुख्यमंत्री हैं और उनके पास विधि विभाग भी है। उन्होंने कहा कि उन्हें इन चिट्ठियों के बारे में कुछ नहीं पता और यह भी नहीं पता कि ये किसके कहने पर भेजी गई थीं। उन्होंने कहा कि एक मुख्यमंत्री का प्रस्ताव लाना और उनके अपने विधि सचिव का उस पर राय देना, ऐसा सिर्फ़ एक केंद्र शासित प्रदेश में ही हो सकता है। विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि उन्होंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया, क्योंकि किसी मंत्री ने उन्हें मंज़ूरी नहीं दी थी। अधिकारियों का बचाव करने वाले भाजपा सदस्यों ने कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है। तब से एक पीडीपी सदस्य ने दोनों अधिकारियों के ख़िलाफ़ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया है, और मैंने बुधवार को शून्य काल में यह मामला उठाया था।
एक विधानसभा अपने सचिव से यह नहीं पूछ सकती कि उसे क्या चर्चा करनी है। किसी राज्य में, कोई भी अधिकारी ऐसा करने की कोशिश नहीं करेगा। उसने यहाँ ऐसा किया, और अपने मंत्री की जानकारी के बिना ; यह शक्तियों के असली संतुलन की सबसे साफ़ तस्वीर है।
*एक कमज़ोर विधान मंडल*
दो साल से यह सदन चल रहा है, बहस कर रहा है और कानून पारित कर रहा है। लेकिन यह उन विषयों पर आज़ादी से कानून नहीं बना सकता, जो लोगों के लिए सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं। यह पुलिस को नियंत्रित नहीं कर सकता, और उन अधिकारियों पर इसका कोई नियंत्रण नहीं है, जो उस प्रशासन को चलाते हैं, जिसकी देखरेख इसे करनी है। यह बिना ज़िम्मेदारी का प्रतिनिधित्व है। इससे हर जनवाद पसंद व्यक्ति को परेशानी होनी चाहिए, न कि सिर्फ़ जम्मू और कश्मीर के लोगों को।
मैंने 21 सितंबर को सदन में इतना ही कहा था। मैंने कहा था कि विधायिका को शक्ति के बिना छोड़ दिया गया है, और यही कारण है कि लोग निराश महसूस करते हैं। मैंने कहा कि आम नागरिकों के अधिकारों में कटौती की गई है और 2019 के बाद से मनमाने ढंग से निर्णय लेने की प्रक्रिया बढ़ी है। लोगों ने 2024 में यह विश्वास करते हुए मतदान किया कि एक निर्वाचित सरकार उन्हें जवाब देने में सक्षम होगी। दो साल बाद, कई लोगों का मानना है कि मतदान को एक इवेंट के रूप में प्रबंधित किया गया था, न कि सम्मान पाने के लिए जनादेश के रूप में।
*बिना भरोसे की सुरक्षा*
प्रशासन दुर्घटनाओं के कम आंकड़ों और दिखने वाली शांति को इस बात का सबूत बताता है कि सुरक्षा बेहतर हुई है, और कुछ मामलों में हुई भी है। लेकिन चौकियों, सत्यापन अभियान और निगरानी में गिनी जाने वाली सुरक्षा, जनता के भरोसे पर बनी सुरक्षा जैसी नहीं है। दोनों में भ्रम हो जाता है, और इस भ्रम की भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
22 जुलाई को अनंतनाग में एक पुलिस हेड कांस्टेबल की हत्या के बाद की घटनाओं ने यह दिखाया है। मुख्यमंत्री समेत सभी ने इस हत्या की निंदा की। इसके कुछ घंटों और दिनों के अंदर, खबर है कि घाटी में हज़ारों लोगों को पूछताछ के लिए उठाया गया, और जिन दो लोगों पर इसमें शामिल होने का शक था, उनके घरों को अगली सुबह, किसी भी मुकदमे से पहले ही तोड़ दिया गया। मुख्यमंत्री ने खुद कहा कि बड़े पैमाने पर हिरासत में लेने और घरों को गिराने से सामान्य हालात वापस नहीं आएंगे। हिंसा के लिए जवाबदेही ज़रूरी है और इस पर किसी को संदेह नहीं है। लेकिन इसे सामूहिक सज़ा से अलग रखना होगा, जो उन परिवारों पर लागू होती है, जिनका इस काम में कोई हाथ नहीं होता और एक बार घर गिरा दिए जाने या किसी नौजवान के हिरासत में एक रात बिताने के बाद इसे अनकिया करना बहुत मुश्किल होता है।
सत्यापन प्रणाली में भी यही चिंता है। एक युवा व्यक्ति, जिसे डर है कि उसके किसी रिश्तेदार के खिलाफ पुराना केस, या किसी दस्तावेज में दर्ज़ होने की वजह से उसकी नौकरी या पासपोर्ट छिन जाएगा, वह अतिरिक्त जांच से सुरक्षित महसूस नहीं करता। उसे लगता है कि उस पर नज़र रखी जा रही है। राजनैतिक पार्टियों ने, जिसमें मैं भी शामिल हूं, बार-बार पाया है कि उसके पदाधिकारियों की नियमित बैठक के लिए अनुमति की ज़रूरत होती है, जो तब तक नहीं दी जाती है और न ही मना की जाती है, जब तक कि दिन न निकल जाए। लोकतंत्र इस बात से भी तय होता है कि क्या नागरिक, प्रशासन की अनुमति के बिना भी संगठित हो सकते हैं और बोल सकते हैं। पारदर्शी प्रक्रिया और दिखने वाले नियंत्रण के ज़रिए समझ-बूझकर भरोसा बनाना होता है, और सिर्फ़ अशांति न होने से भरोसे का होना नहीं माना जा सकता।
*जम्मू को भी कुछ नहीं मिला*
भाजपा का कहना है कि उसे भी राज्य का दर्जा चाहिए और उसे सिर्फ़ स्वायत्तता (ऑटोनॉमी) के ज़िक्र पर एतराज़ है। उसके सदस्यों ने प्रस्ताव को मंज़ूरी देने के लिए विधानसभा अध्यक्ष को हटाने की भी मांग की। इस तर्क की जो भी खूबी हो, यह राज्य के दर्जे की मांग को इलाकों के बीच झगड़े में बदल देता है। भाजपा चाहती है कि यह कश्मीर बनाम जम्मू जैसा विवाद लगे, जबकि ऐसा नहीं है।
2019 के बाद जम्मू के लोगों को बताया गया कि बदलाव से उन्हें फायदा होगा। दरबार मूव, जो श्रीनगर और जम्मू के बीच सरकार को स्थानांतरित करने की 149 साल पुरानी प्रथा थी, 2021 में समाप्त हो गई और जम्मू के व्यापारियों ने उस वर्ष अपने बाजार बंद कर दिए। उनकी शिकायतों में खनन ठेकों को बाहरी लोगों को दिया जाना, शराब की दुकानों की नीलामी से स्थानीय विक्रेताओं को बाहर किया जाना और बड़ी खुदरा शृंखलाएँ, जिनकी बराबरी छोटे दुकानदार नहीं कर सकते, आदि शामिल हैं। बाहर के अधिकारी प्रमुख कैडर पदों पर हैं। 2020 के अधिवास नियमों के तहत, 15 साल तक निवास वाला कोई भी व्यक्ति अधिवास प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकता है, और जम्मू में कई लोग भूमि और रोजगार के बारे में चिंतित हैं। रियासी और कठुआ जैसी जगहों पर हुए हमलों से वे इलाके अशांत हो गए हैं, जो सालों से शांत थे।
जम्मू के लोगों ने भी कश्मीर के लोगों की तरह वही अधिकार खो दिया है, जो कि उनके चुने हुए लोगों द्वारा शासित होने का आम अधिकार है। 2019 के बारे में कोई कुछ भी सोचे, लेकिन सच यही है।
*वादा*
जिन लोगों ने यह वादा लगातार दुहराया है, वही लोग अब सब्र करने को कह रहे हैं। अगस्त 2019 में गृह मंत्री ने संसद में कहा था कि सही समय पर राज्य का दर्जा बहाल कर दिया जाएगा। दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इसे जल्द से जल्द बहाल किया जाए। 2024 के चुनाव प्रचार के दौरान, जम्मू और श्रीनगर में रैलियों में कहा गया कि चुनाव के बाद राज्य का दर्जा मिलेगा। चुनाव हुए और सरकार बनी। दो साल बाद भी अभी तक कोई तारीख तय नहीं हुई है।
*क्या होना चाहिए?*
जम्मू से लेकर कश्मीर तक, और उन पार्टियों के बीच से भी, जो कई मुद्दों पर असहमत हैं, पूर्ण राज्य की मांग एक स्वर में होनी चाहिए। जैसा कि मुख्यमंत्री ने कहा है, यह किसी पार्टी का पक्ष लेना नहीं है और यह किसी एक क्षेत्र को रियायत देना नहीं है। भाजपा के सदस्य जम्मू में उसी व्यवस्था के तहत रहने वाले लोगों के वोटों से इस सदन में बैठते हैं।
केंद्र जब तक चाहे अनुच्छेद-370 और स्वायत्तता पर बहस कर सकता है। राज्य का दर्जा एक अलग मामला है, क्योंकि इसका वादा संसद और सार्वजनिक मंच से किया गया था और सबसे बड़ी अदालत ने इसका निर्देश दिया है। इन बड़े सवालों पर जो भी फैसला हो, दोनों इलाकों के लिए कम से कम इतना तो किया ही जा सकता है कि उन्हें पूर्ण राज्य का दर्जा वापस दे दिया जाए, और यह भी बताया जाए कि कब दिया जाएगा।
(लेखक माकपा की जम्मू कश्मीर इकाई के सचिव हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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