Monday, October 12, 2026
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जिस पीढ़ी की उंगलियों पर दुनिया है, उसे झूठ से नहीं बहकाया जा सकता …जेनरेशन ज़ी, अल्फ़ा और बीटा केवल नई पीढ़ियाँ नहीं, बदलते भारत की नई चेतना हैं… कुछ और नहीं वर्तमान युग की धड़कन है

 

 

 

 

 

जेनरेशन ज़ी, अल्फ़ा और बीटा कोई अवतार नहीं, बल्कि बदलते समय की नई पीढ़ियाँ हैं—अपने-अपने दौर की सामाजिक, तकनीकी और सांस्कृतिक परिस्थितियों में आकार लेती हुई पीढ़ियाँ। वे वर्तमान युग की स्पंदन हैं, उसकी धड़कन हैं। इसलिए उन्हें केवल उम्र के एक वर्ग या किसी फैशनेबल संबोधन के रूप में देखना हमारी बड़ी भूल होगी। खासकर राजनेताओं को ही नहीं, माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची और पूरे समाज को इस पीढ़ी के बदलते मानस को समझना होगा।

ज़ेनरेशन (‘Generation’ )की ये संज्ञाएँ वैज्ञानिक या संवैधानिक श्रेणियाँ नहीं हैं, बल्कि समाजशास्त्रीय-सांस्कृतिक वर्गीकरण हैं। प्रचलित एक वर्गीकरण में ज़ेनरेशन जी (जनरेशन Z )को 1995–2009, अल्फ़ा Generation Alpha को 2010–2024 और बीटा Generation Beta को 2025–2039 में जन्म लेने वाली पीढ़ी माना गया है। इन सीमाओं पर सर्वसम्मति नहीं है, लेकिन यह निर्विवाद है कि इन पीढ़ियों का बचपन डिजिटल तकनीक, इंटरनेट और तीव्र वैश्वीकरण के बीच बीता और बीत रहा है।

आज 21वीं सदी का बच्चा जब तोतली उम्र में बोलना और घुटनों के बल चलना सीख रहा होता है, तभी उसके सामने डिजिटल संसार खुल चुका होता है। जब वह लड़खड़ाते हुए खड़ा होकर चलना और ‘मम्मी-पापा’, ‘दादा-दादी’, ‘चाचा-चाची’ कहना शुरू करता है, तब तक वह मोबाइल स्क्रीन, इंटरनेट, वीडियो, सोशल मीडिया और डिजिटल सामग्री की दुनिया से परिचित हो चुका होता है। आगे चलकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI उसके सीखने, सोचने और जानकारी हासिल करने के तरीकों को और बदल देती है।

इसलिए इस पीढ़ी को झूठ, लफ्फाज़ी, चालबाजी, तिकड़मबाजी अथवा मनगढ़ंत कहानियाँ सुनाकर लंबे समय तक भ्रमित रखना आसान नहीं है। उसके हाथ में सूचना का संसार है। वह किसी एक स्रोत पर निर्भर नहीं है; वह तुलना कर सकता है, सवाल पूछ सकता है, अलग-अलग दृष्टिकोण देख सकता है और अपनी राय बना सकता है। उसे धोखा देने का अर्थ अंततः अपने ही समय की वास्तविकता से आँखें मूँदना है।

इतिहास, भूगोल, गणित, साहित्य, संस्कृति, सभ्यता, धर्म, दर्शन, राजनीति और विज्ञान—इन सबकी जानकारी आज उसकी उंगलियों के स्पर्श भर पर उपलब्ध है। भारत ही नहीं, पूरी दुनिया उसके डिजिटल क्षितिज का हिस्सा है। वह जान सकता है कि स्वतंत्रता संग्राम में किसकी क्या भूमिका थी; किसने आज़ादी के लिए बलिदान दिया, किसने यातनाएँ सहीं, किसने ब्रिटिश सत्ता का विरोध किया और किसने उससे समझौते किए। वह भगत सिंह के विचारों को पढ़ सकता है, जिन्होंने 1930 में जेल में ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ जैसा विचारोत्तेजक लेख लिखा था। वह महान क्रांतिकारी व्लादिमीर लेनिन के विचारों और राजनीतिक संघर्ष का अध्ययन कर अपनी राजनीतिक चेतना को विकसित और सशक्त कर सकता है। आज ज्ञान किसी एक पुस्तक, संस्था या विचारधारा की चारदीवारी में सीमित नहीं है; दुनिया के विविध विचार, दृष्टिकोण और अनुभव उसकी पहुँच में हैं।

वह यह भी जान सकता है कि महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा और सांप्रदायिक सद्भाव को अपने सार्वजनिक जीवन का आधार बनाया और 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे की गोली का शिकार हुए। वह यह भी समझ सकता है कि स्वतंत्रता आंदोलन किसी एक धर्म, जाति, भाषा या समुदाय का आंदोलन नहीं था; उसमें विभिन्न समुदायों और विचारधाराओं के लोगों ने अलग-अलग रूपों में योगदान दिया। यही इतिहास की वास्तविक शक्ति है—वह हमारे पूर्वाग्रहों को चुनौती देता है और हमें अपने अतीत को संपूर्णता में देखने के लिए विवश करता है।

आज की पीढ़ी के सामने यह सवाल भी है कि किसी राजनीतिक दल या संगठन के चमचमाते, सर्वसुविधायुक्त कार्यालय अधिक महत्वपूर्ण हैं या बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण विद्यालय? भाषणों की चमक अधिक जरूरी है या प्रयोगशालाएँ, पुस्तकालय, योग्य शिक्षक और शोध के अवसर? नारों की ऊँचाई अधिक महत्वपूर्ण है या नागरिकों के जीवन की वास्तविक गुणवत्ता? क्या समाज को आवारा, उन्मादी, हिंसक, उपद्रवी और नफ़रत फैलाने वाले युवाओं के समूह चाहिए, या रोजगार से जुड़े, अनुशासित, सभ्य, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक? राष्ट्र को बेहतर कैसे बनाया जाए—यह प्रश्न अब केवल मंचों से सुनने का विषय नहीं रहा; नई पीढ़ी स्वयं उसके उत्तर तलाश सकती है और अपने तर्क, अनुभव तथा वैश्विक दृष्टि के आधार पर समाज और व्यवस्था से जवाब भी मांग सकती है।

इस पीढ़ी का सबसे बड़ा अंतर यही है कि वह सूचना की उपभोक्ता भर नहीं है; वह सूचना की जाँच भी कर सकती है। वह सवाल पूछती है—क्यों? कैसे? किसलिए? किसके लिए? और किस कीमत पर? यही प्रश्न मनुष्य को मनुष्य बनाती है।जो बेहतर व सुंदर समाज एवं राष्ट्र निर्माण नीव होती है।किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति होती हैं। इसलिए प्रश्न पूछने वाली नई पीढ़ी से डरने के बजाय समाज और सत्ता को उसका स्वागत करना चाहिए।

जेनरेशन ज़ी, अल्फ़ा और बीटा जब वैश्विक नजरिया रखते हैं, तब उन्हें यह भी पता है कि दुनिया में हमारा देश कहाँ खड़ा है, हमारी उपलब्धियाँ क्या हैं, हमारी कमियाँ क्या हैं और उन कमियों के कारण क्या हैं। वे केवल यह नहीं पूछते कि भारत को विश्वशक्ति कैसे बनाया जाए; वे यह भी पूछते हैं कि विश्वशक्ति बनने का अर्थ क्या है? क्या केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति पर्याप्त है? क्या भूख, बेरोजगारी, अशिक्षा, असमानता, सामाजिक भेदभाव और कमजोर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के रहते कोई राष्ट्र वास्तव में महान कहलाया जा सकता है?

उनकी समझ में राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों की क्षमता में निहित है। और उस क्षमता का सबसे मजबूत आधार है—उत्तम, समान और वैज्ञानिक शिक्षा। इसलिए प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले; उसकी प्रतिभा आर्थिक स्थिति, जाति, भाषा, लिंग या जन्मस्थान के कारण बाधित न हो। विद्यालय केवल परीक्षा पास कराने की जगह न हों, बल्कि विचार करना, प्रश्न करना, असहमति का सम्मान करना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना और मानवीय संवेदना सीखने के केंद्र बनें।

नई पीढ़ी को यह भी समझ में आ रहा है कि राष्ट्रवाद का अर्थ केवल नारे लगाना नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक के सम्मान, स्वतंत्रता, समान अवसर और गरिमापूर्ण जीवन की रक्षा करना है। उनके लिए भाषा, जाति, संप्रदाय, लिंग, ऊँच-नीच और बड़ा-छोटा जैसी दीवारें धीरे-धीरे अपना अर्थ खो रही हैं। उनकी नज़र में सबसे पहले मनुष्य है। यही दृष्टि भविष्यभारत की सबसे बड़ी पूँजी बन सकती है।

हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि AI और डिजिटल तकनीक केवल उपकरण नहीं रह गए हैं; वे आने वाली पीढ़ियों के जीवन, शिक्षा, रोजगार और विचार-प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली निर्णायक शक्तियाँ हैं। इसलिए बच्चों को तकनीक से दूर रखने के बजाय उन्हें तकनीक का विवेकपूर्ण और जिम्मेदार उपयोग सिखाना होगा। उन्हें यह समझाना होगा कि सूचना और ज्ञान एक ही चीज नहीं हैं; वायरल होना और सत्य होना एक ही बात नहीं है; तकनीकी दक्षता और मानवीय विवेक भी समानार्थी नहीं हैं। AI उत्तर दे सकता है, लेकिन सही प्रश्न पूछने और उत्तर की नैतिकता पर विचार करने की जिम्मेदारी मनुष्य की ही रहेगी।

सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को केवल अनुशासन सिखाने की वस्तु न समझे और नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को केवल पिछड़ा हुआ न माने। दोनों के बीच संवाद का पुल बने। अनुभव और तकनीक का मिलन हो। बुजुर्गों के जीवन-अनुभव और युवाओं की वैज्ञानिक जिज्ञासा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बनें। जिस समाज में पीढ़ियाँ एक-दूसरे से सीखती हैं, वही समाज भविष्य के लिए मजबूत आधार तैयार करता है।

आज आवश्यकता नई पीढ़ी को उपदेश देने से अधिक उसे समझने की है; उसे नियंत्रित करने से अधिक उसके प्रश्नों का सामना करने की है; उसे इतिहास बताने से अधिक इतिहास के प्रति ईमानदार रहने की है। क्योंकि यह वह पीढ़ी है जो केवल यह नहीं पूछेगी कि हमने क्या कहा, बल्कि यह भी देखेगी कि हमने वास्तव में क्या किया।इसलिए सत्ता, समाज और परिवार—तीनों को एक बात गांठ बाँध लेनी चाहिए: नई पीढ़ी को भ्रमित करके भविष्य नहीं बनाया जा सकता। भविष्य केवल सत्य, शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवीय संवेदना, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर ही बनाया जा सकता है।

*आने वाला भारत केवल हमारे भाषणों से नहीं, इन बच्चों की आँखों, सवालों, सपनों और निर्णयों से बनेगा। उनके हाथों में मोबाइल है, उनके सामने पूरी दुनिया है और उनकी उंगलियों पर AI है; उनके भीतर ज्ञान,विवेक, संवेदना और इंसानियत का दैदिव्य प्रकाश है, यही पीढ़ी भारत को केवल विश्व की शक्ति नहीं, विश्व के लिए एक मानवीय, न्यायपूर्ण और ज्ञान-सम्पन्न आदर्श बना सकती है।*

*राष्ट्र का भविष्य बच्चों को क्या बताया गया, इससे कम और उन्हें सत्य देखने, प्रश्न करने, सोचने और सही के पक्ष में खड़े होने की कितनी स्वतंत्रता दी गई—इससे अधिक तय होगा। नई पीढ़ी को डराने की नहीं, समझने की जरूरत है; उसे बहकाने की नहीं, भरोसा देने की जरूरत है। क्योंकि कल का भारत उनके हाथों में है—और उस भारत की नींव आज हमें ही रखनी है।

 

गणेश कछवाहा
चिंतक, लेखक एवं समीक्षक
रायगढ़, छत्तीसगढ़
gp.kachhwaha@gmail.com

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