(लोकतांत्रिक व्यवस्था, नागरिक चेतना और देश की भविष्य-दशा और दिशा )
लोकतंत्र केवल मतदान करने, सरकार चुनने और सत्ता हस्तांतरित करने की व्यवस्था का नाम नहीं है। लोकतंत्र दरअसल उस विश्वास का नाम है, जिसके आधार पर एक सामान्य नागरिक अपने मत के माध्यम से किसी व्यक्ति को देश, समाज और अपने भविष्य के निर्माण की जिम्मेदारी सौंपता है। संसद और विधानसभाएँ केवल कानून बनाने की संस्थाएँ नहीं हैं; वे राष्ट्र की सामूहिक राजनीतिक चेतना और सामाजिक चरित्र का भी प्रतिबिंब होती हैं।
इसीलिए जब राजनीति में धनबल, बाहुबल और आपराधिक पृष्ठभूमि की उपस्थिति लगातार चर्चा का विषय बनने लगे, तो इसे केवल चुनावी राजनीति का प्रश्न मानकर टाल देना उचित नहीं होगा। यह प्रश्न लोकतंत्र की विश्वसनीयता, शासन की नैतिकता, कानून के शासन और उस सामान्य नागरिक के भविष्य से जुड़ जाता है, जिसके नाम पर लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था खड़ी है।
हाल में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत एक रिपोर्ट ने इस चिंता को फिर गंभीरता से हमारे सामने ला खड़ा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, 543 लोकसभा सदस्यों में 251 तथा 233 राज्यसभा सदस्यों में 75 ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इनमें लोकसभा के 170 और राज्यसभा के 40 सदस्य ऐसे मामलों का सामना कर रहे हैं जिन्हें रिपोर्ट में गंभीर आपराधिक मामले की श्रेणी में रखा गया है—अर्थात ऐसे अपराध जिनमें पाँच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है। इसी रिपोर्ट के अनुसार सांसदों और विधायकों के विरुद्ध कुल 4,192 आपराधिक मामले लंबित हैं।
यहाँ एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और नैतिक तथ्य को सावधानी पूर्वक समझना अति आवश्यक है। किसी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज होना उसे अपराधी या दोषी सिद्ध नहीं करता।राजनीतिक जीवन में किसी पर लगाए गए आरोप और न्यायालय द्वारा सिद्ध अपराध को एक ही मान लेना न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध होगा। चिंता का विषय यह नहीं कि इतने जनप्रतिनिधि “अपराधी” हैं; वास्तविक चिंता यह है कि इतने आपराधिक मामले जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक यात्रा के साथ क्यों जुड़े हैं और उनका न्यायिक निपटारा वर्षों तक क्यों लंबित रहता है? लोकतांत्रिक व्यवस्था, नागरिक चेतना और देश की भविष्य-दिशा पर गंभीर चिंतन और आत्ममंथन की शुरुआत होती है।
*आंकड़ों के पीछे छिपा बड़ा सवाल-*
राजनीति के अपराधीकरण की चर्चा कोई नई बात नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनाव से संबंधित ADR के विश्लेषण में निर्वाचित सदस्यों में लगभग 46 प्रतिशत ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामले घोषित किए थे। 2009 में यह अनुपात लगभग 30 प्रतिशत और 2014 में लगभग 34 प्रतिशत था। अर्थात पिछले डेढ़ दशक में घोषित आपराधिक मामलों वाले निर्वाचित सदस्यों के अनुपात में उल्लेखनीय वृद्धि दिखाई देती है।
इन आंकड़ों को देखकर समाज के सामने स्वाभाविक प्रश्न खड़ा होता है—
*क्या राजनीति में प्रवेश का रास्ता धीरे-धीरे विचार, जनसेवा और सार्वजनिक जीवन की विश्वसनीयता से हटकर चुनावी प्रभाव और जीतने की क्षमता पर अधिक निर्भर होता जा रहा है?*
इस प्रश्न का उत्तर किसी एक दल, नेता या विचारधारा को दोषी ठहराकर नहीं दिया जा सकता। उपलब्ध आंकड़ों में विभिन्न राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के निर्वाचित प्रतिनिधियों के विरुद्ध घोषित आपराधिक मामले दिखाई देते हैं। इसलिए समस्या का स्वरूप भी व्यापक है और समाधान भी राजनीतिक व्यवस्था की समग्र समीक्षा से ही संभव होगा।
*धनबल का बढ़ता प्रभाव-*
राजनीति में दूसरी बड़ी चिंता धन की बढ़ती भूमिका है।
धनवान होना अपराध नहीं है। किसी उद्योगपति, व्यवसायी, किसान, पेशेवर अथवा सफल व्यक्ति का राजनीति में आना लोकतांत्रिक रूप से अनुचित नहीं कहा जा सकता। संपत्ति स्वयं किसी व्यक्ति की नैतिकता या सार्वजनिक क्षमता का प्रमाण अथवा प्रमाण-पत्र नहीं है।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब आर्थिक सामर्थ्य राजनीतिक अवसरों का अत्यधिक निर्णायक आधार बनने लगे।लोकतांत्रिक मूल्यों और नीतिनिर्धारण में उनका आधिपत्य हो। ADR के विश्लेषण के अनुसार लगभग 93 प्रतिशत निर्वाचित लोकसभा सदस्य करोड़पति हैं ।
यह आंकड़ा अपने आप में बहुत विचारणीय है। यह निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्न उठाता है—
*क्या सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि वाला, सीमित संसाधनों वाला, लेकिन ईमानदार और सक्षम नागरिक आज भी समान राजनीतिक अवसर प्राप्त नहीं कर सकता है?*
लोकतंत्र का वास्तविक सौंदर्य तभी है जब राजनीति का दरवाजा केवल बड़े संसाधनों वालों के लिए नहीं, बल्कि सामान्य नागरिक के लिए भी खुला रहे।
*राज्यसभा के आंकड़े भी प्रश्न उठाते हैं-*
जून 2026 के ADR विश्लेषण में 226 विश्लेषित राज्यसभा सदस्यों में 69, अर्थात लगभग 31 प्रतिशत, ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामले घोषित किए थे। इसी विश्लेषण के अनुसार इन सदस्यों की औसत घोषित संपत्ति लगभग ₹115.25 करोड़ थी।
यहाँ भी संपत्ति और आपराधिक मामलों को सीधे जोड़ देना उचित नहीं होगा। दोनों अलग-अलग तथ्य हैं। लेकिन जब सार्वजनिक जीवन में अपराध के आरोपों, अत्यधिक आर्थिक संसाधनों और राजनीतिक शक्ति की चर्चा एक साथ सामने आती है, तब लोकतांत्रिक संस्थाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही पर विमर्श होना स्वाभाविक है।
*लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनबल है-*
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनबल है।लेकिन यदि किसी क्षेत्र में मतदाता यह महसूस करने लगे कि चुनाव लड़ने के लिए धन चाहिए, संगठन चाहिए, प्रभाव चाहिए और कभी-कभी बाहुबल भी राजनीतिक शक्ति का माध्यम बन सकता है, तो यह लोकतांत्रिक समानता की मूल भावना के विरुद्ध ही नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक राजनीतिक शक्ति को बहुत कमजोर करता है।यह काफ़ी चिंतनीय है।
राजनीति का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना अवश्य हो सकता है, लेकिन सत्ता अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकती। सत्ता का औचित्य तभी है जब वह— *नागरिक अधिकारों की रक्षा करे,
*कानून के शासन को मजबूत करे,*शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे,*किसान और श्रमिक की सुरक्षा सुनिश्चित करे,*युवाओं के लिए अवसर पैदा करे,*कमजोर और वंचित वर्गों को न्याय दे,*और आर्थिक विकास का लाभ समाज के व्यापक हिस्से तक पहुँचाए।अन्यथा लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया बनकर रह जाएगा।
*गरीब, किसान,वंचित और आमजन की चिंता कौन करेगा?-*
यही इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि –
भारत के करोड़ों किसान आज भी कृषि आय, लागत, बाजार, मौसम और ऋण जैसी अनेक चुनौतियों से जूझते हैं। करोड़ों श्रमिकों का जीवन रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा है। युवा रोजगार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की तलाश में हैं। छोटे व्यापारी और स्वरोजगार से जुड़े लोग आर्थिक अनिश्चितताओं का सामना करते हैं।उनके हितों के बारे में कौन सोचेगा ,उनके हित में नीति निर्धारण की दृष्टि समान कैसे होगी ? इत्यादि प्रश्न विमर्श के केंद्र बिंदु बन जाते हैं।
*ऐसे में लोकतंत्र से उनकी अपेक्षा स्वाभाविक है कि नीति-निर्माण का केंद्र सत्ता नहीं, नागरिक होना चाहिए।*
यदि राजनीतिक विमर्श केवल चुनाव जीतने की रणनीति तक सीमित हो जाए, तो गरीब की रोटी, किसान की आय, श्रमिक की सुरक्षा आत्मसम्मान , बच्चे की शिक्षा ,मरीज का इलाज,स्वास्थ और आवास जैसे प्रश्न पीछे छूट सकते हैं।
लोकतंत्र की सार्थकता इसी में है कि संसद में उठने वाले प्रश्नों में देश के सबसे कमजोर नागरिक की आवाज भी सुनाई दे।नीतियाँ अंतिम अर्थात् सीमांत व्यक्ति तक पहुँचे
*न्यायपालिका ने समय-समय पर महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किए हैं -*
सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों को आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों के चयन के संबंध में जानकारी सार्वजनिक करने और यह बताने का निर्देश दिया है कि ऐसे उम्मीदवार को क्यों चुना गया तथा बिना आपराधिक पृष्ठभूमि वाले किसी अन्य व्यक्ति को क्यों नहीं चुना गया। न्यायालय ने यह भी कहा कि चयन का आधार केवल “winnability” अर्थात चुनाव जीतने की संभावना नहीं होना चाहिए, बल्कि उम्मीदवार की योग्यता, उपलब्धियों और मेरिट जैसे आधार भी सामने आने चाहिए।
यह निर्देश लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता को रेखांकित करता है—मतदाता को जानकारी चाहिए।जानकारी होगी तो विवेकपूर्ण निर्णय की संभावना बढ़ेगी।
*मतदाता के हाथ में एक बड़ी शक्ति है -*
आज चुनावी व्यवस्था में नागरिकों के लिए उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि जानने के साधन उपलब्ध हैं।
मतदाता यदि केवल जाति, धर्म, क्षेत्र, व्यक्तिगत संबंध, प्रचार या तत्कालीन भावनात्मक मुद्दों के आधार पर निर्णय लेने के बजाय उम्मीदवार की—
*शिक्षा, सार्वजनिक जीवन, संपत्ति, आपराधिक मामलों, राजनीतिक कार्य, संसदीय प्रदर्शन और जनसेवा के रिकॉर्ड को भी देखे, तो चुनावी राजनीति की गुणवत्ता पर उसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है।लोकतंत्र में सबसे बड़ा सुधार संसद से पहले मतदाता की चेतना में होता है।*
*राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी सबसे बड़ी है-*
राजनीतिक दल लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। उम्मीदवार कौन होगा, यह तय करने में उनकी भूमिका केंद्रीय है।
इसलिए केवल मतदाता को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा।
राजनीतिक दलों को स्वयं से कुछ कठिन प्रश्न पूछने होंगे—
क्या उम्मीदवार का चयन केवल चुनावी जीत की संभावना से होना चाहिए?
क्या आर्थिक सामर्थ्य राजनीतिक योग्यता का विकल्प बन सकता है?
क्या सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक जनसेवा करने वाले सामान्य नागरिकों को पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं?
क्या गंभीर आपराधिक मामलों से जुड़े उम्मीदवारों के चयन का कारण जनता के सामने पर्याप्त पारदर्शिता से रखा जा रहा है?
इन प्रश्नों का उत्तर किसी एक दल को नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र को देना होगा।
लेकिन किसी भी स्थिति में न्याय की गति इतनी तेज नहीं होनी चाहिए कि वह न्याय की निष्पक्षता को ही प्रभावित कर दे।
जल्द न्याय आवश्यक है; गलत न्याय नहीं।
*चुनावी राजनीति में पारदर्शिता क्यों जरूरी है?*
चुनाव लोकतंत्र का पर्व है, लेकिन चुनावी खर्च लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती भी बन सकता है यदि उसकी पारदर्शिता कमजोर हो।
चुनावी वित्त का स्पष्ट हिसाब, राजनीतिक दलों के वित्तीय स्रोतों की पारदर्शिता, उम्मीदवारों के खर्च की प्रभावी निगरानी और नागरिकों के लिए वित्तीय जानकारी की आसान उपलब्धता आवश्यक है।
यहाँ निर्वाचन आयोग की व्यवस्थाएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल संस्थागत व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक दल, उम्मीदवार, मीडिया और नागरिक समाज—सभी की जिम्मेदारी है कि चुनावी वित्त को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाए।
*आत्मनिर्भर भारत के लिए आत्मनिर्भर लोकतंत्र भी चाहिए-*
आत्मनिर्भर भारत केवल उत्पादन बढ़ाने या आर्थिक विकास की अवधारणा नहीं है।
एक वास्तविक आत्मनिर्भर राष्ट्र के लिए—
*मजबूत संस्थाएँ, स्वतंत्र न्यायपालिका, जवाबदेह विधायिका, निष्पक्ष चुनाव, पारदर्शी राजनीतिक वित्त और जागरूक नागरिक समाज भी उतने ही आवश्यक हैं।
यदि संस्थाएँ मजबूत होंगी तो व्यक्ति से ऊपर व्यवस्था खड़ी होगी।
यदि व्यवस्था पारदर्शी होगी तो नागरिक का विश्वास बढ़ेगा।
यदि नागरिक का विश्वास बढ़ेगा तो लोकतंत्र मजबूत होगा।
और यदि लोकतंत्र मजबूत होगा तो विकास अधिक टिकाऊ और समावेशी बनने की संभावना बढ़ेगी।
*समाधान केवल कानून में नहीं, राजनीतिक संस्कृति में भी है-*
कानून बनाना आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं।
राजनीति की संस्कृति बदलनी होगी।
सार्वजनिक जीवन में यह स्वीकार करना होगा कि ईमानदारी कमजोरी नहीं है, सादगी पिछड़ापन नहीं है और जनसेवा राजनीतिक अयोग्यता नहीं है।
राजनीति में ऐसे नागरिकों के प्रवेश को प्रोत्साहन मिलना चाहिए जिनके पास विचार हैं, सामाजिक सरोकार हैं, सार्वजनिक जीवन का अनुभव है और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता है।
साथ ही नागरिक समाज, विश्वविद्यालयों, मीडिया और सामाजिक संस्थाओं को भी राजनीतिक साक्षरता बढ़ाने की भूमिका निभानी होगी।
*सवाल हमसे भी है-*
हम अक्सर पूछते हैं—“राजनेता ऐसे क्यों हैं?”लेकिन लोकतंत्र में एक दूसरा प्रश्न भी पूछा जाना चाहिए—“हम उन्हें चुनते क्यों हैं?”यह प्रश्न किसी मतदाता को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आत्ममंथन के लिए है।
क्योंकि उम्मीदवार सामने आते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय नागरिक करता है।
यदि समाज केवल तत्काल लाभ, जातीय समीकरण, धार्मिक पहचान, व्यक्तिगत प्रभाव या प्रचार से प्रभावित होगा, तो राजनीतिक दल भी उसी प्रकार के उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति रख सकते हैं।
लेकिन यदि नागरिक पूछे—
“आपने मेरे क्षेत्र के लिए क्या किया?”
“आपकी नीति क्या है?”
“आपकी संपत्ति कैसे बढ़ी?”
“आपके विरुद्ध मामले क्या हैं और उनकी स्थिति क्या है?”*
“आप संसद में किन मुद्दों को उठाएँगे?”,
“गरीब, किसान, श्रमिक और युवा के लिए आपका दृष्टिकोण क्या है?”,
तो राजनीति को भी अपने उत्तर बदलने पड़ेंगे।
लोकतंत्र की दिशा कौन तय करेगा?-
यही हमारे समय का सबसे बड़ा प्रश्न है।
यदि धनबल और बाहुबल राजनीति पर प्रभाव डालेंगे, तो लोकतंत्र की दिशा कौन तय करेगा?
यदि राजनीतिक दल केवल चुनावी गणित से उम्मीदवार चुनेंगे, तो जनसेवा का स्थान कौन लेगा?
यदि न्यायालयों में मामले वर्षों तक लंबित रहेंगे, तो जनता का विश्वास कैसे कायम रहेगा?
यदि गरीब, किसान, मजदूर और वंचित नागरिक केवल चुनावी भाषणों में दिखाई देंगे, तो उनकी वास्तविक समस्याएँ नीति के केंद्र में कैसे आएँगी?
और यदि नागरिक स्वयं जागरूक नहीं होगा, तो लोकतंत्र को बेहतर कौन बनाएगा?
इन प्रश्नों का उत्तर किसी एक व्यक्ति के पास नहीं है।
इसका उत्तर संस्थाओं, राजनीतिक दलों, न्यायपालिका, मीडिया और सबसे बढ़कर नागरिक समाज की सामूहिक जिम्मेदारी में छिपा है।
लोकतंत्र को बचाने का रास्ता लोकतंत्र से ही निकलेगा-
भारत का लोकतंत्र विशाल है, विविध है और अनेक कठिन दौरों से गुजरते हुए भी जीवित और सक्रिय रहा है।इसलिए राजनीति में अपराधीकरण, धनबल या संस्थागत चुनौतियों पर चिंता का अर्थ लोकतंत्र से निराश होना नहीं है।
बल्कि इसके विपरीत—
चिंता लोकतंत्र को बेहतर बनाने की पहली सीढ़ी है।
हमें राजनीति को बदनाम नहीं करना है; उसे अधिक उत्तरदायी बनाना है।
हमें जनप्रतिनिधियों को केवल संदेह की दृष्टि से नहीं देखना है; उनके सार्वजनिक रिकॉर्ड को तथ्य की कसौटी पर परखना है।हमें आरोप और अपराध में अंतर करना है।हमें धनवान और भ्रष्ट में अंतर करना है।हमें राजनीतिक विरोध और व्यक्तिगत वैमनस्य में अंतर करना है।
सबसे महत्वपूर्ण—हमें सत्ता और सेवा में अंतर समझना होगा।
क्योंकि सत्ता स्थायी नहीं होती।जनता स्थायी है।संविधान स्थायी है।लोकतांत्रिक मूल्य स्थायी होने चाहिए।
अहम सवाल ,सवाल दर सवाल है जवाब हमें चाहिए –
अहम सवाल यह है की ,सवाल दर सवाल है जवाब हमें चाहिए आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह नहीं पूछेंगी कि हमारे समय में कितने चुनाव हुए।
वे पूछेंगी—क्या हमने लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी बनाया?क्या हमने न्याय को अधिक सुलभ बनाया?क्या हमने गरीब की आवाज को अधिक मजबूत किया?क्या हमने राजनीति में विचार और जनसेवा के लिए स्थान बनाया?क्या हमने धन और बाहुबल से ऊपर जनबल को प्रतिष्ठित किया?इन प्रश्नों का उत्तर आज हमें ही देना है।*
यह ध्यान देने की जरूरत है की – *लोकतंत्र केवल संसद में नहीं बैठता।वह किसान के खेत में है, मजदूर के हाथ में है, विद्यार्थी की आँखों में है, गरीब की उम्मीद में है और हर नागरिक के मत में है।
इसलिए राजनीति के अपराधीकरण की चुनौती से लड़ने का पहला कदम किसी व्यक्ति या दल को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, न्याय को अधिक त्वरित, चुनाव को अधिक निष्पक्ष और नागरिक को अधिक जागरूक बनाना है।
लोकतंत्र की आत्मा को बचाने का रास्ता किसी बाहरी शक्ति से नहीं निकलेगा।
वह निकलेगा—संविधान की मर्यादा से,न्याय की निष्पक्षता से, राजनीति की पारदर्शिता से, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही से और नागरिक की जागरूकता से।और शायद आज पूरे राष्ट्र को इसी एक संकल्प की सबसे अधिक आवश्यकता है—
“सत्ता का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, लोकसेवा होना चाहिए;
चुनाव का आधार केवल धन और प्रभाव नहीं, जनविश्वास होना चाहिए;
और शासन में व्यक्ति या दल से ऊपर—संविधान सर्वोच्च होना चाहिए।
[संदर्भ स्रोत :- ( प्रमुख दस्तावेजी आधार: सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत 2026 की रिपोर्ट/ADR आंकड़े, ADR के लोकसभा 2024 एवं राज्यसभा 2026 विश्लेषण तथा निर्वाचन आयोग की उम्मीदवार-शपथपत्र)]
लेखक /-
गणेश कछवाहा
चिंतक ,लेखक एवं समीक्षक
रायगढ़,छत्तीसगढ़।
gp.kachhwaha@gmail.com

Recent Comments