रायगढ़।
छत्तीसगढ़–उड़ीसा सीमा के टपरिया बॉर्डर पर रायगढ़ के ट्रांसपोर्टरों और गाड़ी मालिकों पर किया गया हमला अब एक गंभीर अंतरराज्यीय कानून-व्यवस्था का मुद्दा बनता जा रहा है। उड़ीसा के कुछ ट्रांसपोर्टरों और गाड़ी मालिकों द्वारा संगठित रूप से हथियारों के साथ किया गया यह हमला न केवल भयावह है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या रायगढ़ के ट्रांसपोर्टरों को शांतिपूर्वक व्यापार करने की आज़ादी नहीं है?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 18 जनवरी की शाम रायगढ़ जिला ट्रेलर मालिक कल्याण संघ के अध्यक्ष आशीष यादव अपने साथियों के साथ हमीरपुर बॉर्डर स्थित इंडियन ऑयल पेट्रोल पंप के पीछे यूनियन कार्यालय में वाहनों के संचालन को लेकर बैठक कर रहे थे। इसी दौरान उड़ीसा के ट्रांसपोर्टर घनश्याम उर्फ बंटी डालमिया सहित अन्य नामजद आरोपियों के साथ 100 से 140 अज्ञात लोग अचानक मौके पर पहुंचे।
आरोप है कि सभी हमलावर रिवॉल्वर, पिस्टल, तलवार, हॉकी स्टिक, लकड़ी के डंडों और जहरीले स्प्रे से लैस थे। उन्होंने यूनियन कार्यालय को घेरकर अंदर घुसते हुए अश्लील गालियां दीं, ट्रांसपोर्टरों की आंखों में स्प्रे डाला और उन्हें सड़क पर घसीटकर बेरहमी से पीटा।
इस हमले में शंकर अग्रवाल, प्रभाशंकर, सुभाष पांडेय, संजय अग्रवाल और सतीश कुमार चौबे सहित कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। मारपीट के बाद हमलावरों ने यूनियन कार्यालय से चार टोकन और करीब 15 हजार रुपये नकद लूट लिए तथा जाते-जाते सभी को जान से मारने की धमकी दी।
यूनियन का आरोप है कि हमला पूरी तरह पूर्व नियोजित था और इसका उद्देश्य छत्तीसगढ़ के ट्रांसपोर्टरों पर दबाव बनाना था। बताया गया कि कुछ दिन पहले 67 और 33 प्रतिशत लोडिंग के आपसी समझौते के बावजूद उड़ीसा की खदानों में फिर से अवैध वसूली और दादागिरी शुरू कर दी गई थी, वहीं छत्तीसगढ़ की गाड़ियों को अनुपातिक लोडिंग नहीं दी जा रही थी।
यूनियन पदाधिकारियों ने गंभीर आशंका जताई है कि उड़ीसा में फंसी रायगढ़ की गाड़ियों और चालकों के साथ किसी भी समय बड़ी हिंसक घटना हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि रायगढ़ ट्रेलर यूनियन किसी भी प्रकार की अवैध वसूली नहीं करती, टोकन सिस्टम पूरी तरह आपसी सहमति और नियमों के तहत संचालित होता है।
इस पूरे मामले में तमनार थाने में भारतीय न्याय संहिता 2023 की धाराएं 296, 351(3), 115(2), 118(1), 191(2), 191(3), 190, 310(2) तथा आर्म्स एक्ट की धारा 25 और 27 के तहत एफआईआर दर्ज की गई है, जो यह दर्शाता है कि मामला साधारण विवाद नहीं बल्कि संगठित हिंसा, लूट और सार्वजनिक शांति भंग करने से जुड़ा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
आखिर बार-बार उड़ीसा से आने वाले हमलावरों को किसका संरक्षण प्राप्त है?
क्या रायगढ़ के ट्रांसपोर्टरों को जीने, खाने और व्यापार करने का अधिकार नहीं?
और क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है?
अब निगाहें प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं कि क्या आरोपियों की शीघ्र गिरफ्तारी होगी और क्या रायगढ़ के ट्रांसपोर्टरों को वास्तविक सुरक्षा मिल पाएगी, या फिर यह आक्रोश और असुरक्षा यूं ही बढ़ती रहेगी।

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